नमामि गंगे कार्यक्रम का असर, 2017 के बाद गंगा में औद्योगिक प्रदूषण 60% घटा – modi government master stroke Stricter Monitoring New Treatment Plants Help Reduce Industrial Pollution in Ganga kanpur prayagraj lcly


केंद्र सरकार के महत्वाकांक्षी नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत गंगा नदी में पहुंचने वाले औद्योगिक प्रदूषण में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है. कार्यक्रम से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, वर्ष 2017 की तुलना में गंगा में जाने वाले औद्योगिक प्रदूषण भार में करीब 60 प्रतिशत की गिरावट आई है. सकल प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों (जीपीआई) से निकलने वाला जैविक ऑक्सीजन मांग (बीओडी) भार 2017 में 26 टन प्रतिदिन था, जो 2024 में घटकर 10.75 टन प्रतिदिन रह गया है.

अधिकारियों का कहना है कि यह सुधार प्रदूषण नियंत्रण के लिए लागू की गई सख्त निगरानी व्यवस्था, अपशिष्ट उपचार परियोजनाओं और उद्योगों पर बढ़ाई गई जवाबदेही का परिणाम है.

जाजमऊ टेनरी क्षेत्र में सबसे बड़ा बदलाव
गंगा के मुख्य प्रवाह में औद्योगिक प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों में शामिल कानपुर के जाजमऊ टेनरी क्षेत्र में सबसे प्रभावी सुधार देखने को मिला है. लंबे समय तक जाजमऊ से निकलने वाला दूषित पानी गंगा प्रदूषण का प्रतीक माना जाता रहा था.

प्रदूषण नियंत्रण के लिए यहां 20 एमएलडी क्षमता का कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (सीईटीपी) स्थापित किया गया, जिसका उद्घाटन दिसंबर 2023 में हुआ था और अब यह पूर्ण क्षमता के साथ संचालित हो रहा है. यह संयंत्र टेनरियों से निकलने वाले क्रोमियम, कार्बनिक अपशिष्ट और रंगयुक्त रसायनों का उपचार करता है. इसके अलावा, वर्षों से गंगा में सीधे गिरने वाले सिसामऊ नाले को भी इंटरसेप्ट किया गया. यह नाला पहले प्रतिदिन लगभग 140 एमएलडी बिना उपचारित सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट गंगा में प्रवाहित करता था.

कानपुर में जल गुणवत्ता में सुधार, कुछ चुनौतियां बाकी
अधिकारियों के मुताबिक कानपुर क्षेत्र में जल गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया है. फर्रुखाबाद से पुराना राजापुर उपखंड तक बीओडी स्तर में कमी आई है, हालांकि स्नान योग्य जल गुणवत्ता के निर्धारित मानक अभी पूरी तरह हासिल नहीं हो सके हैं.

मथुरा और उन्नाव में भी चल रही परियोजनाएं
मथुरा में 6.5 एमएलडी क्षमता वाला सीईटीपी चालू हो चुका है, जो मथुरा रिफाइनरी समेत रासायनिक और डाई उद्योगों के अपशिष्ट का उपचार कर रहा है. उपचारित जल का उपयोग दोबारा रिफाइनरी में किया जा रहा है, जिससे ताजे पानी की खपत और नदी में अपशिष्ट जल के प्रवाह में कमी आई है.

वहीं, उन्नाव के बंथर औद्योगिक क्षेत्र में 4.5 एमएलडी क्षमता का सीईटीपी निर्माणाधीन है, जो टेनरियों और रासायनिक इकाइयों से निकलने वाले अपशिष्ट के उपचार में मदद करेगा.

उद्योगों पर बढ़ी निगरानी
गंगा बेसिन में स्थित सभी बड़े प्रदूषणकारी उद्योगों का हर वर्ष स्वतंत्र एजेंसियों से ऑडिट और निरीक्षण कराया जाता है. निरीक्षण रिपोर्ट केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) और संबंधित राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को भेजी जाती है. नियमों के उल्लंघन पर पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति वसूली जाती है, जबकि लगातार उल्लंघन करने वाली इकाइयों के खिलाफ बंदी की कार्रवाई भी की जाती है. मानसून और त्योहारों के दौरान सीपीसीबी विशेष आकस्मिक निरीक्षण भी करता है, क्योंकि इस अवधि में प्रदूषण बढ़ने की आशंका रहती है.

लेदर इंडस्ट्रीज में अनिवार्य किए गए ट्रीटमेंट प्लांट  
सरकार ने बीते समय में हर लेदर फैक्ट्री मैं एक ट्रीटमेंट प्लांट बनाना अनिवार्य किया है, जिससे फैक्ट्री के अंदर ही खतरनाक रसायन सॉलिड फॉर्म में अलग कर जाते हैं. जबकि बाकी पानी ट्रीटमेंट प्लांट में चला जाता है. 
 

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