उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में 1977 में हरिहर शरण की हत्या हुई थी. इस हत्याकांड के लगभग 49 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने पांच आरोपियों को बरी कर दिया. हालांकि दो आरोपी पहले ही दुनिया छोड़ चुके हैं. बाकी बचे तीन बरी कर दिए गए.
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने जांच में गंभीर गड़बड़ियों और एफआईआर भेजने में देरी के आधार पर ट्रायल कोर्ट और इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला पलट दिया. कोर्ट ने साफ कहा कि अभियोजन पक्ष इन आरोपियों को दोषी साबित करने में नाकाम रहा है. कोर्ट को अभियोजन प्रक्रिया में गंभीर कमियां भी मिलीं. मसलन FIR को मजिस्ट्रेट तक भेजने में बिना वजह देरी हुई.
पुलिस के एफआईआर दर्ज करने में विसंगतियां मिलीं. ऐसे हालात भी मिले जिनसे कथित चश्मदीद गवाहों की मौजूदगी पर शक पैदा होता है. कोर्ट ने सूबेदार, हीरा लाल और राज बक्स की अपील मंज़ूर करते हुए ट्रायल कोर्ट व इलाहाबाद हाईकोर्ट का निर्णय रद्द कर दिया. इन दोनों कोर्ट्स ने उन्हें IPC की धारा 148 और 302 (धारा 149 के साथ) के तहत दोषी ठहराया था. दो अन्य आरोपियों के खिलाफ अपीलें पहले ही उनकी मौत के कारण खत्म हो गई थीं. एक आरोपी की मौत हाई कोर्ट में अपील लंबित रहने के दौरान हो गई.
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गोंडा जिले में कंचनपुर गांव के पास 28 जून 1977 को हरिहर शरण की हत्या हुई थी. अभियोजन पक्ष के अनुसार, मृतक पर मवेशियों के मेले से लौटते समय भाले, लाठी और अन्य हथियारों से लैस 6 आरोपियों ने हमला किया था. ट्रायल कोर्ट ने 1981 में आरोपियों को दोषी ठहराया था. हाई कोर्ट ने 2011 में इस सज़ा बरकरार रखी थी.
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा है कि हमने गौर किया कि घटना के दिन शाम 7:10 बजे FIR दर्ज कराई गई, लेकिन मृतक का शव पूरी रात घटनास्थल पर ही पड़ा रहा. न तो पुलिस और न ही परिवार ने उसे सुरक्षित किया. कोर्ट को इस बात का भी कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला कि घटना के लगभग दो दिन बाद, 30 जून को पोस्टमार्टम क्यों किया गया.
बेंच ने यह भी परखा कि अभियोजन पक्ष के गवाहों ने इस बारे में अलग-अलग बातें कहीं कि FIR दर्ज कराने के लिए शिकायतकर्ता के साथ पुलिस स्टेशन कौन गया? शिकायतकर्ता का दावा था कि उसके साथ केवल एक गवाह गया था. वहीं पुलिस की जनरल डायरी में दो अन्य रिश्तेदारों की मौजूदगी भी दर्ज थी.
कोर्ट के अनुसार, इस विसंगति ने अभियोजन पक्ष के मामले की बुनियाद पर ही चोट की. एक और अहम बात FIR की सूचना थाने के अधिकार-क्षेत्र वाले मजिस्ट्रेट तक पहुंचने में देरी की थी.
एफआईआर 28 जून को दर्ज की गई. लेकिन यह मजिस्ट्रेट के पास 30 जून को पहुंची. कोर्ट ने इस पर कहा कि भले ही ये देरी केस को खराब नहीं करती, लेकिन यह तब अहम हो जाती है जब हालात के सूक्ष्म निरीक्षण से पता चले कि FIR का समय या अभियोजन पक्ष की कहानी में कई विसंगतियां है.
कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के केस की सच्चाई और विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए कहा कि FIR का समय बदला गया और बाद में अभियोजन पक्ष की कहानी को इस तरह से गढ़ा गया ताकि घटना स्थल पर कथित चश्मदीद गवाहों की मौजूदगी दिखाई जा सके.
बिना किसी ठोस कारण के लगभग 48 घंटे की देरी के बाद पोस्टमार्टम किया गया. कोर्ट ने सवाल उठाया कि पुलिस स्टेशन के पास होने के बावजूद शव कई घंटों तक बिना किसी देखरेख के कैसे पड़ा रहा. कोर्ट ने इस स्थिति को चौंकाने वाला और साफ तौर पर अजीब बताते हुए कहा कि FIR दर्ज होने के बाद भी जांच एजेंसी या पीड़ित के परिवार ने शव को सुरक्षित रखने या संभालने की कोई कोशिश नहीं की.
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