AIIMS नहीं, MCD अस्पताल का ‘चमत्कार’! 83 दिन मौत से जंग, 40 दिन वेंटिलेटर… 11 साल की बच्ची को सरकारी अस्पताल से म‍िली नई जिंदगी – Guillain barre syndrome successful treatment delhi mcd hospital child recovery Tvisa


जब किसी बच्चे की सांसें गले में बने एक सुराख और वेंटिलेटर की मशीन पर टिक जाएं, जब निजी अस्पतालों के लाखों-करोड़ों के बिल  गरीब परिवार के पैरों तले जमीन खिसका दें, तब उम्मीद की आखिरी किरण सरकारी अस्पताल ही बनते हैं. जो गंभीर मरीजों की जान भी बचाते हैं और उनका पैसा भी, ऐसा ही एक चमत्कार दिल्ली एमसीडी के स्वामी दयानंद अस्पताल के डॉक्टरों ने किया है. आमतौर पर जिस बीमारी का इलाज दिल्ली एम्स जैसे संस्थान या किसी बड़े हॉस्पिटल में होता है उसको  दयानंद अस्पताल (SDH) के डॉक्टरों ने कर दिखाया है. यहां डॉक्टरों ने एक 11 साल की बच्ची जिसको गुइलेन-बैरे सिंड्रोम नाम की एक रेयर बीमारी थी उसका ट्रीटमेंट किया है. यह बीमारी लाखों में किसी 1 को होती है.

इसका इलाज काफी मुश्किल होता है. ये बच्ची करीब 40 दिन वेंटिलेटर आईसीयू सपोर्ट पर रही और उसके बाद 43 दिन एचडीयू में रही. कुल 83 दिन अस्पताल में कई डॉक्टरों ने मिलकर उसका इलाज किया. अब वह ठीक होकर और खुद चलकर घर लौट गई है.बच्चों को उसके माता- पिता गंभीर हालत में अस्पताल लेकर आए थे. वह बहुत ज्यादा कमजोरी हो गई थी, जिससे उसकी सांस लेने की क्षमता पर असर पड़ा था. इस वजह से उसे वेंटिलेटर सपोर्ट और ट्रेकियोस्टॉमी (सांस लेने के लिए गले में छेद करना) समेत आईसीयू में रखा गया था. इलाज का खर्च इतना ज्यादा था कि प्राईवेट अस्पताल में ट्रीटमेंट कराना काफी मुश्क्लि हो गया था. इस वजह से माता- पिता एमसीडी के अस्पताल लेकर आए थे. आमतौर पर ऐसे मामलों को बड़े सरकारी सेंटर में रेफर कर दिया जाता है, लेकिन एसडीएम के डॉक्टरों ने बच्ची का इलाज किया और उसको ठीक कर दिया. 

क्या होती है गुइलेन-बैरे सिंड्रोम बीमारी

स्वामी दयानंद अस्पताल में पीडियाट्रिक विभाग में हेड डॉ. सुरेंद्र सिंह बिष्ट ने इस बारे में Aajtak.in को बताया है. उन्होंने कहा कि GBS की शुरुआत हाथ-पैरों में कमज़ोरी से हो सकती है और यह धीरे-धीरे ऊपर की ओर बढ़ सकती है. गंभीर मामलों में, यह बीमारी सांस लेने वाली मसल्स पर असर करती है जानलेवा भी साबित होती है.

डॉ. सुरेंद्र सिंह बिष्ट ने बताया कि लगभग 11 साल की उस बच्ची को गुइलेन-बैरे सिंड्रोम था. इस बीमारी में शरीर का इम्यून सिस्टम पेरिफेरल नर्व्स शरीर के बाहरी हिस्सों की नसों पर हमला करता है, जिससे कमजोरी आ जाती है. आमतौर पर, कमजोरी पैरों या हाथों से शुरू होती है और धीरे-धीरे ऊपर की ओर बढ़ सकती है. मरीज को सांस लेने में बहुत दिक्कत हो सकती है और उसे वेंटिलेटर सपोर्ट की जरूरत पड़ सकती है. कुछ मामलों में, मरीज बेहोश भी हो सकता है, ये जानलेवा भी हो सकता है. 

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25 से 30 लाख रुपये हो सकता था प्राइवेट अस्पताल में इलाज का खर्च

डॉ सिंह ने बताया कि इस बच्ची को करीब डेढ़ महीने तक वेंटिलेटर पर रखा गया. कुल 83 दिन बच्ची अस्पताल में रही. प्राइवेट अस्पतालों में इसका इलाज कराने में 25 से 30 लाख रुपये का खर्च हो जाता. बच्ची के माता- पिता ने पहले कुछ दिन शुरू में प्राइवेट में इलाज कराया था, लेकिन आर्थिक स्थिति खराब होने के चलते वह यहां अस्पताल आए. डॉ सिंह ने बताया कि इस बीमारी के इलाज के लिए इम्यूनोग्लोबुलिन इंजेक्शन लगते है, एक इंजेक्शन की कीमत ही 15 हजार रुपये तक होती है, अस्पताल में यह इंजेक्शन भी निशुल्क लगाया गया. इसके अलावा बाकी सभी इलाज भी बिलकुल फ्री में हुआ. इस बच्ची के ट्रीटमेंट के लिए कई डॉक्टरों की टीम ने मिलकर दिन-रात मेहनत की है. 

83 दिन के इलाज के बाद घर लौटी बच्ची

डॉ सिंह ने बताया कि जब बच्ची अस्पताल आई तो बच्ची की हालत काफी गंभीर थी. उन्हें ठीक से सांस लेने में दिक्कत हो रही थी क्योंकि बीमारी ने सांस लेने में मदद करने वाली मांसपेशियों को प्रभावित किया था, सांस लेने में मदद के लिए हमें उन्हें वेंटिलेटर पर रखना पड़ा.
सांस लेने के लिए सुरक्षित रास्ता बनाए रखने और लंबे समय तक सांस लेने में मदद की ज़रूरत होने के कारण, उनकी ट्रेकियोस्टोमी भी करनी पड़ी. बच्ची लगभग डेढ़ महीने तक वेंटिलेटर सपोर्ट पर रही. जैसे-जैसे उनकी हालत में सुधार हुआ, हमने धीरे-धीरे उन्हें वेंटिलेटर से हटा दिया. अलग-अलग चरणों में उन्हें ऑक्सीजन और CPAP सपोर्ट की भी ज़रूरत पड़ी. अब 83 दिन के इलाज के बाद बच्ची ठीक है और उसकी छुट्टी कर दी गई है. 

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बच्ची के इलाज में आईसीयू टीम का नेतृत्व डॉ. रणजीत चटर्जी, डॉ. रमेश और डॉ. रवि ने किया, जो आईसीयू के रेजिडेंट डॉक्टर हैं
ईएनटी टीम का नेतृत्व डॉ. कामेश्वर, डॉ. दरवेश, डॉ. पूनम और डॉ. उर्वशी ने किया. जो सीनियर डॉक्टर हैं. लैब मेडिसिन टीम का नेतृत्व डॉ. अवनींदर, डॉ. कौशल, डॉ. मुक्ता, डॉ. शैली और डॉ. दीप्ति ने किया.
 

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