टेंट-मेजबान तैयार… मगर मेहमानों का पता नहीं! क्या ऐसी है पाकिस्तान की पीस टॉक की हालत – peacemaker or player pakistan double game ceasefire explained tstf


पाकिस्तान को अक्सर ऐसा देश माना जाता है जो आपदा में अवसर तलाशता है. इस बार पाकिस्तान के लिए मंच भी बड़ा है. दुनिया एक तरफ अमेरिका और ईरान के टकराव, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर खतरे और ईंधन संकट जैसी चिंताओं में उलझी है, तो दूसरी तरफ पाकिस्तान ने एंट्री मार ली है ये कह कर हम सुलह करवा देंगे.

कुछ दिन का सीजफायर हुआ भी, लेकिन एक्सपर्ट्स पहले ही चेतावनी दे रहे हैं कि यह शांति कुछ ही दिनों की मेहमान है.फिर भी इस्लामाबाद का आत्मविश्वास देखने लायक है.ऐसा लग रहा है कि दुनिया की सबसे मुश्किल पहेली का हल उन्हीं के पास है.

जमीन पर नजारा भी कम दिलचस्प नहीं है. इस्लामाबाद में सुरक्षा ऐसी है कि आम आदमी सोच रहा है-मीटिंग है या मिशन? Geo News और Dawn की रिपोर्ट्स बताती हैं कि रेड जोन में सख्ती बढ़ा दी गई है, पुलिस-रेंजर्स तैनात हैं, एंट्री-एग्जिट पर कड़ी निगरानी है. ऊपर से सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो-खाली सड़कें, कम ट्रैफिक-देखकर लोग कह रहे हैं, भाई, ये बातचीत है या ट्रेलर ऑफ लॉकडाउन?

देखें ये वायरल वीडियो

क्या ईरान नहीं होगा शामिल

इस कहानी का दूसरा पहलू भी है. एक तरफ इस्लामाबाद में बातचीत की तैयारियां चल रही हैं और खबरें हैं कि डोनाल्ड ट्रंप और जे.डी. वेंस जैसे बड़े नाम आ सकते हैं, वहीं दूसरी तरफ जिस देश से बातचीत करनी है, वही ईरान इसमें शामिल होने के मूड में नहीं दिख रहा.

ईरान के इस फैसले के पीछे सबसे बड़ा कारण भरोसे की कमी बताया जा रहा है. ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने हालिया बयान में कहा कि अमेरिकी पक्ष की ओर से कथित संघर्षविराम उल्लंघन खासतौर पर ईरानी जहाज से जुड़े घटनाक्रम ने पूरे माहौल को प्रभावित किया है. इससे न सिर्फ अमेरिका पर, बल्कि इस पूरी प्रक्रिया पर भी ईरान का भरोसा कमजोर हुआ है.

ऐसे में तेहरान फिलहाल किसी नई वार्ता में शामिल होने से बचता नजर आ रहा है. जब तक उसे यह यकीन नहीं होता कि बातचीत निष्पक्ष और गंभीर तरीके से आगे बढ़ेगी, तब तक उसके शामिल होने की संभावना बेहद कम मानी जा रही है. यही वजह है कि इस्लामाबाद की यह पहल शुरू होने से पहले ही अधर में लटकी दिख रही है.

अब कहानी का असली ट्विस्ट यहीं आता है. जब पाकिस्तान कूटनीतिक मंच सजाने में व्यस्त है, उसी दौरान सऊदी अरब से 3 अरब डॉलर का पैकेज भी पूरा हो जाता है. पहले 2 अरब, फिर 1 अरब. कागजों में यह पुरानी डील है, लेकिन टाइमिंग ऐसी कि कोई भी सोचने पर मजबूर हो जाए कि पाकिस्तान यहां क्या कर रहा है.

पाकिस्तान का ये है खेल

यहीं से कहानी सिर्फ ‘पीस एफर्ट’ नहीं रहती, ‘डिप्लोमैटिक पोजिशनिंग’ बन जाती है. एक तरफ पाकिस्तान खुद को मध्यस्थ के तौर पर पेश कर रहा है-जैसे बिना उसके दुनिया की शांति अधूरी हो और दूसरी तरफ आर्थिक मोर्चे पर भी राहत मिल रही है. एक्सपर्ट्स इसे बड़ी शांति नहीं, बल्कि बड़ा ‘पोजिशनिंग गेम’ कहते हैं.जहां दिखना भी उतना ही जरूरी है जितना करना.

दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तान के अंदर ही लोग इस पूरे शो को बड़े ध्यान से देख रहे हैं. सोशल मीडिया पर तंज चल रहा है -तैयारियां पूरी हैं, लेकिन मेहमान ही नहीं आ रहे. कुछ लोग इसे ‘खाली कुर्सियों वाली डिप्लोमेसी’ बता रहे हैं. यानी मंच सज चुका है, शामियाना लग गया है, लेकिन मेहमान नहीं आ रहे हैं.

आखिर में तस्वीर यही बनती है.इस्लामाबाद में एक साथ दो कहानियां चल रही हैं. एक, जहां पाकिस्तान खुद को शांति का सूत्रधार दिखा रहा है. दूसरी, जहां वही देश इस मौके पर अपनी कूटनीतिक अहमियत और आर्थिक मजबूती दोनों बढ़ाने की कोशिश करता दिख रहा है. अब यह ‘पीस मिशन’ है या ‘पोजिशनिंग प्लान’.यह तय करना शायद उतना ही मुश्किल है जितना उस बातचीत का नतीजा, जो अभी शुरू भी नहीं हुई. ऐसे में सवाल ये भी क्या पाकिस्तान सच में अमन चाहता है. 

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