जमुई की घटना इसलिए नहीं हुई कि बिहार पर कोई श्राप लगा हुआ है. जब भी बिहार पर कोई खबर बनती है, तो वह ऐसी ही खौफनाक खबर होती है. और जब भी इस राज्य को देश का शर्मनाक चेहरा कहा जाता है, तो मुझ जैसे बिहारियों के कलेजे में एक टीस उठती है. यह टीस समझ आती है, क्योंकि जख्म अभी ताजा है. और हम यह भूल चुके हैं कि जमुई में जो हुआ, वैसा देश के लगभग हर राज्य में हो चुका है. आगे भी यह कहीं न कहीं दोबारा होगा. शायद किसी ऐसी जगह जहां इंटरनेट की रफ्तार और बेहतर हो, और लोगों का जमीर और भी मरा हुआ.
तीन दिन पहले राष्ट्रीय राजधानी को नेहरू प्लेस मेट्रो स्टेशन के पास अपना ‘जमुई’ मिला. जहां का एपिक्यूरिया मॉल साउथ दिल्ली के युवाओं में खासा फेमस है. संडे को एक टीनएज लड़की ने मॉल के नजदीक आस्थाकुंज पार्क में अपने दोस्त के साथ रात पौने नौ बजे जाने की हिम्मत की. तभी तीन शख्स पुलिसवाले बनकर आए. जिनमें से दो तो भाई ही थे. लड़की को अलग ले गए, और गैंगरेप कर डाला.
बिहार की असली दिक्कत यह नहीं है कि यहां बुरी घटनाएं होती हैं. दिक्कत यह है कि इस बुरी खबर को दबाने या बैलेंस करने के लिए कोई अच्छी खबर नहीं होती. बाकी राज्यों में महीने में एक खौफनाक खबर आती है, तो उसे दबाने के लिए दस अच्छी खबरें भी आ जाती हैं. लेकिन बिहार के हिस्से में क्या आता है? बाढ़, भुखमरी, आपसी दुश्मनी, पलायन और कोई समाधान नहीं. बिहार से पहले एक खौफनाक खबर आती है, फिर दूसरी, और फिर किसी बड़े नेता की प्रेस कांफ्रेंस जिसमें इसे ‘छुटपुट, या अलग-थलग घटना’ बता दिया जाता है. इस बार तो JDU के प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा और पीछे चले गए. वे 2005 के दौर में पहुंच गए ताकि सबको याद दिला सकें कि उस समय का जंगलराज इससे कितना ज्यादा खराब था. बयानबाजी और राजनीति चरम पर पहुंच गई, लेकिन इस पूरी उठापटक में किसी का ध्यान 15 साल के उन दो बच्चों पर नहीं गया, जिनका वीडियो इन दरिंदों ने अपनी उपलब्धि मानकर इंटरनेट पर फैला दिया था.
10वीं क्लास में पढ़ने वाले दो बच्चे, एक लड़का और एक लड़की, शाम को अपनी कोचिंग खत्म करके रास्ते में कुछ तस्वीरें खींचने के लिए रुक गए थे. यह किसी भी आम टीनेजर की एक बहुत ही सामान्य सी शाम थी. युवाओं में ऐसी जगह ढूंढने का कौतूहल रहता है, जहां वे कुछ पल साथ गुजार सकें. क्योंकि, एक लड़की के पास बॉयफ्रेंड होना समाज में अब भी ‘पाप’ है, और इस पर दया नहीं दिखाई जाती.
वे दोनों जमुई के नजदीक स्थित मड़वा पहाड़ के पास पहुंचे. ये जगह अपनी प्राइवेसी की वजह से नए जोड़ों के बीच काफी मशहूर है. तभी 6-7 आदमियों के एक झुंड ने (जिसमें कुछ नाबालिग भी थे) उन्हें घेर लिया. वे उनसे सवाल-जवाब करने लगे कि क्या उनके घरवाले यह सब जानते हैं, फिर लड़के को मारा-पीटा और जब दोनों वहां से भागने लगे तो उनका पीछा किया. एक आदमी ने तो लड़की को उठाकर अंधेरे की तरफ भागना शुरू कर दिया, जबकि लड़का लगातार उसे छुड़ाने की कोशिश में उस आदमी को पीछे से खींचता रहा. एक गंदे-मैले आदमी द्वारा उस नाबालिग लड़की को इस तरह उठाकर ले जाने के मंजर ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया. वीडियो में लड़की को हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाते हुए सुना जा सकता है कि ‘हमें छोड़ दो, हम फिर कभी यहां नहीं आएंगे’. शुरुआत में तो उन बच्चों ने पुलिस में शिकायत तक दर्ज नहीं कराई थी. जब वीडियो वायरल हुआ, तब पुलिस ने उनकी स्कूटी के नंबर से उनका पता लगाया और उनसे संपर्क किया.
स्थानीय विधायक, जो सरकार में मंत्री भी हैं, ने इसे ‘गलत दिशा में गई मॉरल पुलिसिंग’ कह दिया. ‘मॉरल पुलिसिंग’ बुजदिलों का गढ़ा हुआ एक ऐसा शब्द है जिसका इस्तेमाल किसी घिनौने अपराध की गंभीरता को कम करने के लिए किया जाता है. यह कोई मॉरल पुलिसिंग नहीं थी. यह सीधे-सीधे एक नाबालिग लड़की के साथ हुआ सामूहिक यौन उत्पीड़न था. वे आदमी उस लड़की को पहाड़ी के सूने इलाके में ले जाकर उसके साथ गलत काम करना चाहते थे और इस दौरान उसका वीडियो बनाना चाहते थे. अगर वह लड़का हिम्मत न दिखाता और उसे न पकड़ता, तो वे अपने इरादे में कामयाब हो जाते. ऐसा ही तरीका देश के कई राज्यों में अपनाया जा चुका है, मुझे अलग से गिनाने की जरूरत नहीं है.
मैं इस इलाके को अच्छी तरह जानता हूं. मैं यहां के शिकारियों, उनके शिकार और इस खौफनाक खेल को भी अच्छी तरह समझता हूं. मैं जानता हूं कि मड़वा पहाड़ किस तरह की जगह है. ऐसी जगहें बिहार के लगभग हर जिले में मिल जाएंगी. कोई पहाड़ी या नदी का किनारा, जो फोटो में तो बहुत अच्छा लगता है लेकिन जहां किसी की नजर नहीं होती. प्रेमी जोड़े थोड़ी से एकांत की चाह में वहां जाते हैं, क्योंकि हमारा घुटनभरा समाज उन्हें अकेले रहने के लिए कोई और जगह नहीं देता. वहां घात लगाकर बैठे शिकारी आदमी इस बात का पूरा फायदा उठाते हैं. वे जानते हैं कि हमारे ज्यादातर घरों में प्यार करना पहले ही एक गुनाह माना जाता है, इसलिए वह जोड़ा कभी शिकायत करने नहीं जाएगा. जब इन आदमियों की हिम्मत बढ़ जाती है, तो वे अगले जोड़े के साथ भी यही दोहराते हैं, और फिर उसके बाद वाले के साथ भी.
आरोपियों को पकड़ लिया गया है. उनमें से आखिरी और मुख्य आरोपी को पैर में गोली लगने के बाद ही पकड़ा जा सका, जिसे हाफ-एनकाउंटर कहा जा रहा है. ये दरिंदे कहीं बाहर से नहीं आए थे. ये पास के ही गांव के लड़के थे, जिन्होंने बहुत मुमकिन है कि पहले भी ऐसा किया हो. पहले की पीड़ितों ने कभी मुंह नहीं खोला, क्योंकि समाज में दोहरा दाग लगने का डर रहता है. एक तो यौन उत्पीड़न की बात और दूसरा, उससे भी बड़ा ‘गुनाह’ यानी बॉयफ्रेंड का होना.
अब आगे देखिए क्या होता है. जमुई को कुछ हफ्तों का वक्त दीजिए, फिर इस मामले को सुलझाने के बजाय पहचान की राजनीति इसे संभालने आ जाएगी. गुड़गांव में भी यही हुआ था. एक महिला बाइकर को लगभग मार ही डालने के आरोप में गिरफ्तार हुए आरोपी के समर्थन में कुछ ही दिनों में कारों की रैली निकाली गई और महापंचायत बुलाई गई. अगर कैमरे के सामने एक महिला को जान से मारने की कोशिश करने वाले आदमी को समाज का हीरो बनाया जा सकता है, तो जमुई के मामले में भी यही होगा, जैसे ही जाति या धर्म को अपने बंदे का बचाव करने का मौका मिलेगा.
मैंने अपनी एक पुरानी बात फिर से शेयर की थी कि बिहार में ‘संस्कृति की समस्या’ है. इस पर प्राउड बिहारी भड़क गए और पूछने लगे कि एक आपराधिक मामले में संस्कृति को बीच में क्यों लाया जा रहा है. वहीं कुछ दूसरे लोग भोजपुरी के अश्लील गानों की तरफ इशारा करने लगे, मानो गानों और नाच में गंदगी फैलाना सिर्फ बिहार की ही देन हो. ऐसा बिल्कुल नहीं है. देश के हर हिस्से में इसका अपना वर्जन मौजूद है. हर राज्य में ऑर्केस्ट्रा और रिकॉर्ड डांस होता है. हर राज्य के साथ आपका अनुभव अलग हो सकता है, और मेरा अनुभव भी अलग-अलग राज्यों में अलग रहा है.
अश्लील गानों का पॉपुलर हो जाना सिर्फ बिहार की ही बात नहीं है. अलग बात यह है कि बिहार में इस अश्लीलता से ऊपर कुछ भी बेहतर मौजूद नहीं है. सांस्कृतिक जड़ों की पूरी तरह से कमी है. इसलिए बिहार में रहने वाले आप और बाकी सब जो देखते हैं, वह सिर्फ अश्लील डांस, फूहड़ धुनें और गानों के नाम पर भरी गई ऐसी गालियां और गंदगी है जिन्हें यहां लिखा भी नहीं जा सकता.
भरत शर्मा व्यास या शारदा सिन्हा जैसी आवाजें आज डीजे वाले ट्रकों से बजने वाले ऑटो-ट्यून और डबल-मीनिंग गानों के शोर में कहीं दबकर रह गई हैं.
गंभीर गरीबी ने पीढ़ियों पहले बची-खुची समझ और पसंद को भी खत्म कर दिया. और पसंद या समझ, भाषा की तरह विरासत में नहीं मिलती. इसे आसपास का माहौल सिखाता है. यहां संगीत की कोई गंभीर परंपरा नहीं बची है. ऐसा कोई क्लासिकल डांस स्कूल नहीं है जहां चेन्नई, पुणे या पास के कोलकाता की तरह कोई बच्चा गलती से भी चला जाए. यहां ऐसा कोई माहौल ही नहीं है जहां सुंदरता या कला को अनजाने में भी सीखा जा सके.
यहां सिर्फ एक ही चीज है- भीषण और कभी न खत्म होने वाली होड़. हजार लड़कों के पीछे किसी एक सरकारी नौकरी की होड़. हर परिवार अपने घर में एक आईएएस अफसर चाहता है, लेकिन बहुत हुआ तो उसे किसी ठीक-ठाक कॉलेज में एक सीट मिल जाती है, जो खुद इस राज्य में बहुत मुश्किल से मिलती है.
आप किताबों की दुकानों पर चले जाइए, आपको वहां ऐसी चीजें नहीं मिलेंगी जो सिर्फ पढ़ने का आनंद देती हों. ये दुकानें प्रतियोगी परीक्षाओं की किताबों से भरी पड़ी हैं, बशर्ते स्कूली किताबों के बाद कोई जगह बचे. पटना के बाहर आपको कोई लाइब्रेरी या म्यूजियम खोजने में पसीने छूट जाएंगे. बिहारी संस्कृति की खूबसूरती, इसके पुराने गौरव के अवशेष, लगभग हर ऐतिहासिक इमारत समय की मार के आगे खो चुकी है.
जिंदगी बहुत कठिन है, और यह कठिनाई हर सांस में महसूस होती है. जिनमें काबिलियत होती है, वे जिस दिन मौका मिलता है, यहां से निकल जाते हैं. रह जाते हैं वो जिन्हें न अच्छे नंबर मिले और न ही जिनके पास साधन हैं. वे जमीन के छोटे-छोटे टुकड़ों के लिए आपस में लड़ते रहते हैं, और अक्सर यह लड़ाई खून-खराबे तक पहुंच जाती है. यहां हर चीज पर झगड़ा है. चाहे वह जमीन हो, इज्जत हो या फिर किसी पहाड़ी पर बैठी कोई लड़की.
पहली कमी के साथ ही एक दूसरी कमी भी खड़ी है, जो जमुई की घटना को किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम या डांस स्कूल की कमी से कहीं बेहतर तरीके से समझाती है. हर सर्वे और राजनीतिक जानकार के हिसाब से बिहार में देश की सबसे ज्यादा राजनीतिक रूप से जागरूक आबादी रहती है. यहां का एक रिक्शावाला भी टीवी एंकरों से बेहतर सीट बंटवारे का गणित समझा देगा. मंडल दौर के दशकों लंबे आंदोलन ने जातिगत पहचान को चुनावी ताकत दी- एक आवाज दी, आरक्षण दिया, और अपने नेता के नाम पर एक पहचान दी जो आपकी तरह दिखता और बोलता है. यह एक तरह की ताकत है, और इसे चाहने के लिए किसी को माफी मांगने की जरूरत नहीं है. लेकिन यह ताकत सिर्फ वोटों की गिनती और जीती जाने वाली सीटों के रूप में आई. इसके साथ वह सबसे जरूरी सबक नहीं आया जो किसी भी ताकत के साथ आना चाहिए- वह है संयम. मुश्किल हालातों से इंसान का चरित्र मजबूत होना चाहिए था, लेकिन बिहार में बुरे वक्त ने लोगों की इंसानियत को ही निगल लिया.
इंसानी फितरत की बुराइयों को रोकने या काबू में करने वाला कुछ नहीं था. जिन लोगों के पास खोने के लिए कुछ नहीं होता, उनके लिए दांव पर भी कुछ नहीं होता. लाखों नवयुवकों के दिमाग में हर तरह की हिंसा भरी पड़ी है. वे इसे इसलिए दबाकर नहीं बैठे हैं कि वे इसे बाहर नहीं निकाल सकते. वे इसे इसलिए रोके हुए हैं क्योंकि किसी शाम अपनी भड़ास निकालने के मौके कम मिलते हैं. क्योंकि जब भी उन्हें कोई मौका मिलता है, वे उस पर टूट पड़ते हैं- चाहे वह कोई लड़का हो या कोई लड़की.
एक समाज एक ही समय में बहुत ज्यादा पॉलिटिकल और पूरी तरह से बेकाबू हो सकता है. वास्तव में ऐसा ही होता है, क्योंकि वह कभी नागरिक मर्यादा सीख ही नहीं पाया. सामाजिक संयम के बिना राजनीतिक जागरूकता जिम्मेदार नागरिक नहीं बनाती. वह ऐसे आदमी बनाती है जिन्हें खुद पर शर्मिंदा होने की कोई जरूरत महसूस नहीं होती.
अब ऐसे लोगों के हाथ में एक स्क्रीन और सस्ता डेटा दे दीजिए, और फिर देखिए दरिंदों की गिनती कैसे कई गुना बढ़ जाती है. हम ऐसी घटनाओं में फोन को सिर्फ एक मूकदर्शक मानते रहते हैं, जबकि यह एक हथियार की तरह है. और यह हथियार साल-दर-साल एक ऐसी आबादी के हाथ में दिया जा रहा है जिसे कभी किसी तरह का संयम नहीं सिखाया गया. न राजनीतिक, न सामाजिक और न ही व्यक्तिगत. किसी इंसान को हाथ में ग्रेनेड दे दीजिए और उसे यह मत बताइए कि उसे कैसे पकड़ना है, तो कोई काम होने से पहले उसका खुद का हाथ ही उड़ जाएगा.
हमने कम पढ़े-लिखे, बेरोजगार और बिल्कुल खाली बैठे युवाओं की एक पूरी पीढ़ी के हाथ में कैमरे वाला फोन, सस्ता डेटा पैक और अश्लील गंदे कंटेंट की न खत्म होने वाली सप्लाई थमा दी है. यह कंटेंट ठीक उन्हीं कामनाओं को भड़काता है जिन्हें एक बेहतर समाज और संस्कृति काबू करना सिखाती है. साथ ही उन्हें एक ऐसा राजनीतिक माहौल मिला है जिसने उन्हें दिखा दिया है कि अपनी जाति या समुदाय के लोगों का कैसे आंख बंद करके बचाव किया जाता है. इसका नतीजा यह है कि अपनी हवस को दबाकर जीने वाले स्थानीय लोग अश्लील कंटेंट बना रहे हैं, जिसे वही हवस दबाए बैठे युवा देख रहे हैं. जो राजनीतिक रूप से भटके हुए हैं और सोच से पूरी तरह से फूहड़ हो चुके हैं.
उनकी शिकायत, अगर इसे शिकायत कहा जा सके, तो बहुत ही साधारण और बदसूरत है. 21वीं सदी की औरतें उनकी 19वीं सदी की सोच और फंतासी के हिसाब से मौजूद नहीं हैं, जबकि इंस्टाग्राम रील्स पर वही औरतें उन्हें बाकी आधुनिक और समझदार पुरुषों के लिए ‘उपलब्ध’ दिखाई देती हैं. जिस चीज को वे हासिल नहीं कर सकते, उसे हासिल करने का एक ही तरीका वे जानते हैं- अंधेरे में झपट लेना. अभी बहुत पुरानी बात नहीं है जब लोग शाम ढलने के बाद परिवार के साथ सफर करने से बचते थे, क्योंकि इन्हीं जैसे आदमी कमजोर लोगों पर टूट पड़ते थे और जो भी कीमती चीज मिलती, छीन लेते थे. और औरतें उनके लिए सबसे आसान और कीमती निशाना थीं. जमुई इस बात की याद दिलाता है कि शाम के साथ बढ़ने वाला अंधेरा आज भी खतरा लेकर आता है, और यह कहना कि हम साल 2026 में जी रहे हैं, सिर्फ एक नंबर भर है. अंधेरे में आज भी शिकारी छिपे हुए हैं. लड़कियां आज भी सुरक्षित नहीं हैं. सरकार के बयानों और इनकार के बावजूद, हाल की कई घटनाएं इस बात का सबूत हैं.
बीजेपी और जेडीयू के नेता लोगों को बार-बार ‘जंगलराज’ की याद दिलाते रहते हैं. सच यह है कि लालू राज से पहले भी यह जंगल कुछ बहुत बेहतर नहीं था. और लालू राज के बाद भी बिहार का यही हाल रहा है. आजादी के बाद से सरकारें बदलती रहीं, लेकिन लोगों ने कोई खास बदलाव नहीं देखा. बीच-बीच में कानून-व्यवस्था की स्थिति कभी सुधरी तो कभी बिगड़ी, लेकिन बिहार का यह स्याह पहलू कभी रौशन नहीं हुआ. इस अंधेरे का दायरा और गहरापन भले अलग-अलग हो सकता है.
जाति, धर्म और राज्य सरकार सब इस बात पर आपस में लड़ेंगे कि जमुई की घटना से किसे शर्मिंदा होना चाहिए. लेकिन इनमें से कोई भी इस बात पर ध्यान नहीं देगा कि एक खाली शाम, हथेली में मौजूद अश्लील कंटेंट और किसी बेहतर संस्कृति का न होना ही काफी है कि इस हफ्ते के खत्म होते-होते ऐसी घटना दोबारा घट जाए. मोबाइल में सिग्नल, या जिसे लोग ‘टावर’ कहते हैं, वह तो फुल है, लेकिन समझ बिल्कुल शून्य है. चाहे नागरिक समझ की बात हो या इंसानियत की.
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