पत्रकारिता के एक युग का जीवंत दस्तावेज – senior journalist ram bahadur rai life journey book assi ke rai sahab ntc dhrj


बुकः अस्सी के राय साहब 

संपादकः हेमंत शर्मा

पब्लिशरः प्रभात प्रकाशन

दामः 995

‘अस्सी के राय साहब’ यूं तो एक कद्दावर पत्रकार के जीवन के विभिन्न पहलुओं पर उनके मित्रों, सहयोगियों और समकालीन पत्रकारों के लिखे लेखों का संग्रह है लेकिन जैसे-जैसे हम इसके पन्ने खोलते जाते हैं वैसे-वैसे यह धारणा मजबूत होती जाती है कि यह किताब समकालीन राजनीति, समाज और पत्रकारिता की दुनिया को समझने वाला एक ग्रंथ है. प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित 448 पृष्ठों की पुस्तक रामबहादुर राय के व्यक्तित्व और कृतित्व पर व्यापक प्रकाश डालती है.  आज जब पत्रकारिता पर बाजार, सत्ता, विचारधारा और संस्थागत दबावों को लेकर लगातार बहस होती है, तब ‘अस्सी के राय साहब’ केवल एक पत्रकार के अस्सी वर्ष पूरे होने का दस्तावेज नहीं रह जाती. वह यह सवाल भी सामने रखती है कि पत्रकारिता को पेशे से आगे बढ़ाकर जीवन-मूल्य और सार्वजनिक जिम्मेदारी मानने वाली पीढ़ी ने अपने समय को किस तरह देखा और जिया. पुस्तक के संपादक वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा हैं जिन्होंने रामबहादुर राय की पत्रकारिता और जीवन को बहुत नजदीक से देखा है. पुस्तक  में जेपी आंदोलन, आपातकाल, सांस्कृतिक सरोकार और सार्वजनिक जीवन पर सौ से अधिक लेख शामिल हैं. 

एक पत्रकार से ज्यादा एक संस्था

राय साहब को सिर्फ एक पत्रकार के रूप में पढ़ना उनके व्यक्तित्व को सीमित करना होगा. राय साहब की जिंदगी की शुरूआत एक छात्र नेता के तौर पर होती है. एक ऐसा छात्र नेता जो बिहार में जेपी क्रांति का सूत्रधार बनता है. मीसा अधिनियम के तहत में पटना में पहली गिरफ्तारी होती है.कुछ महीनों बाद छूटकर आते हैं तो इमरजेंसी लगती है और उन्हें फिर जेल भेज दिया जाता है. उनके समकालीन नेता लालू प्रसाद यादव ,सुशील मोदी, रविशंकर प्रसाद आदि अपने बाद के जीवन काल में देश के कद्दावर नेताओं में शुमार होते हैं.पर राय साहब अपने राजनीतिक जीवन के चरम पर पहुंचकर पत्रकारिता का दामन थाम लेते हैं. हिंदुस्थान समाचार, जनसत्ता और नवभारत टाइम्स जैसे संस्थानों में पत्रकारिता के दौरान उन्होंने कभी अपने  विचार को अपनी पत्रकारिता पर हावी नहीं होने दिया.वे जिस विचार के विरोधी होते थे उसे भी उसे भी बहस में लाने की कोशिश करते थे.

जैसा कि पुस्तक के संपादक हेमंत शर्मा लिखते हैं कि उनके विचारों  में गांधी का हिंद स्वराज, लोहिया की सप्तक्रांति, जेपी की संपूर्ण क्रांति,  आंबेडकर जातिमुक्त भारत, दीनदयाल उपाध्याय का अंतिम आदमी  और आचार्य कृपलानी के गांधीवादी समाजवाद की विरासत है. हेमंत शर्मा लिखते हैं कि उनके लेखन में सावरकर के राष्ट्रवाद पर गांधी का हिंद स्वराज भारी पड़ता है. पुस्तक में उनके बारे में लिखे गए शीर्षक यह तस्दीक करते हैं कि वे पत्रकार से अधिक विचारक, मार्गदर्शक, संस्कृति-साधक हैं.

राय साहब की पत्रकारिता

अपने संपादकीय लेख में हेमंत शर्मा इस पुस्तक की जरूरत की विवेचना करते हुए एक जगह लिखते हैं कि राय साहब पर पुस्तक लिखना इसलिए जरूरी था क्योंकि आज की पत्रकारिता और तमाम पत्रकारों को वे शर्मिंदा करते हैं.वे सत्ता में रहते हुए भी सत्ता की मैग्नेटिक फील्ड से बाहर रहते हैं.वे तमाम प्रभावशाली लोगों, अवसरों और आमंत्रणों के बावजूद दूरी बनाकर रखते हैं. ये हम सभी जानते हैं वे एबीवीपी के बड़े नेता रहे. वो खुद स्वीकार करते हैं कि आपातकाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रयासों से उन्हें जेल से मुक्ति मिली. पर अपने संबंधों को कभी उन्होंने अपनी पत्रकारिता पर हावी नहीं होने दिया. हेमंत शर्मा लिखते हैं कि वे सत्ता में राज नहीं नीति के तलाश में रहते हैं.उनमें वैचारिक संकीर्णता नहीं है. राष्ट्रवाद से लेकर साम्यवाद, गांधीवाद और समाजवाद तक सभी का  समन्वय है.उनकी टोली में कार्ड होल्डर नक्सली भी रहते रहे.इसलिए उनकी स्वीकार्यता परस्पर विरोधी खेमे में भी गजब की है.चंद्रशेखर, वीपी सिंह, चितरंजन सिंह (एम.एल) और संघ राजनीति के चार छोर हैं. 

बोली और व्यवहार में अहिंसक राय साहब वैचारिक प्रतिबद्धताओं के बावजूद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और तब के संघ प्रमुख कुप सी सुदर्शन के खिलाफ खडगहस्त हुए. ऑपरेशन वेस्ट एंड रिश्वत कांड के भंडाफोड़ पर राय साहब ने वाजपेयी सरकार पर जमकर प्रहार किए. 3 सितंबर 2000 को आपने कॉलम में लिखते हैं- अटल बिहारी वाजपेयी नैतिक जिम्मेदारी लें और इस्तीफा दें. वाजपेयी सरकार इस नए व्याकरण के लिए इतिहास में नफरत से याद की जाएगी. हेमंत शर्मा लिखते हैं कि अपनी इसी बेबाकी के लिए राय साहब प्रभाष जोशी के लिए प्रिय थे जबकि बाद के  संपादकों को चुभते थे. एक और किस्सा याद किया जाता है. राय  साहब ने सुषमा  स्वराज  पर एक खबर लिखी.खबर यह थी कि रोमेश शर्मा नाम का एक नटवरलाल था जिसे राजनीति का चस्का लगा. उस दौर में हेलिकॉप्टर खरीद उसने देश भर में दौरे शुरू किए. उसने एक राजनीतिक दल बनाया. इस राजनीतिक दल के पीछे सुषमा जी थीं. ऐसी खबर थी. सुषमा जी के दफ्तर से फोन आया, जनसत्ता के तत्कालीन संपादक अच्युतानंद जी ने खबर रोक दी. राम बहादुर राय नहीं माने उन्होंने रोमेश शर्मा की जालसाजी पर फिर खबर लिखी. वह खबर छपी और रोमेश शर्मा गिरफ्तार हुए.

हेमंत शर्मा की संपादकीय भूमिका

इस पुस्तक का संपादन भी एक उपलब्धि है.क्योंकि बकौल हेमंत शर्मा इस तरह की पुस्तक छापने के लिए स्वयं  राम  बहादुर राय सहमत नहीं थे. बड़े मान मनौव्वल के बाद वो तैयार हुए. हेमंत शर्मा स्वयं लंबे समय तक पत्रकारिता में रहे हैं और रामबहादुर राय के साथ उनके संबंध केवल औपचारिक नहीं हैं. इसलिए पुस्तक में आत्मीयता स्वाभाविक है. लेकिन संपादक की चुनौती भी यही रही होगी कि इतनी बड़ी संख्या में संस्मरणों और लेखों को एक ऐसी संरचना दी जाए जिससे पुस्तक केवल ‘राय साहब की प्रशंसा’ का संग्रह न रह जाए.

उपलब्ध सामग्री से लगता है कि पुस्तक को राय साहब के जीवन के अलग-अलग आयामों में बांटकर यह प्रयास किया गया है. इससे पाठक एक ही व्यक्ति को कई कोणों से देखने में सक्षम होता है. देश के गृहमंत्री अमित शाह, रक्षामंत्री राजनाथ सिंह से लेकर नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी, गोविंदाचार्य से लेकर राय साहब के समकालीन संपादकों और पत्रकारों के विचारों को किताब में जगह देना आसान नहीं था. इस तरह के संकलन में संपादक का व्यक्तिगत कौशल ही काम आता है. जिसे पुस्तक के संपादक मंडली ने बहुत ही खूबसूरती से किया है.पुस्तक में वरिष्ठ पत्रकार संजीव और राम बहादुर राय का संवाद भी पढ़ने लायक है. इस विस्तृत संवाद को पढ़कर तत्कालीन राजनीति,समाज और पत्रकारिता को समझना आसान हो जाता है.

पत्रकारिता के छात्रों के लिए जरूरी

पत्रकारिता के इतिहास को केवल अखबारों, संपादकीयों और घटनाओं के जरिए नहीं समझा जा सकता. उसके पीछे काम करने वाले व्यक्तित्व, उनके संघर्ष, उनके रिश्ते और उनके समय के साथ उनके संवाद भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं. ‘अस्सी के राय साहब’ इसी अर्थ में महत्वपूर्ण पुस्तक है. यह केवल रामबहादुर राय के अस्सी वर्ष पूरे होने पर प्रकाशित अभिनंदन ग्रंथ नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत की पत्रकारिता और लोकतांत्रिक चेतना के एक महत्वपूर्ण दौर को अलग-अलग आंखों से देखने का प्रयास है. इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता है कि इसमें अलग-अलग विचारधारा से जुड़े लोगों ने लेख लिखे हैं. यह कोई जीवनी नहीं है  इसमें अलग-अलग पत्रकारों, लेखकों, सहकर्मियों और राय साहब से जुड़े लोगों ने अपने-अपने अनुभवों और दृष्टिकोण से उन्हें समझने की कोशिश की है. विषय-सूची पर नजर डालें तो ‘पत्रकारिता के धर्मसाधक’, ‘आपातकाल का लोकतंत्र प्रहरी’, ‘वैचारिक पत्रकारिता के अमिट हस्ताक्षर’, ‘सत्य और सरोकार के सेतु’, ‘जेपी आंदोलन के सूत्रधार’, ‘सिद्धांतों पर टिके रहने की जिद’ और ‘शोर के समय का संयत तपस्वी’ जैसे शीर्षक अपने आप में राय साहब के सार्वजनिक व्यक्तित्व के अलग-अलग पहलुओं की ओर संकेत करते हैं.

यही कारण है कि सही अर्थों में पुस्तक पत्रकारिता-संस्कृति का संस्मरणात्मक दस्तावेज बन गया है. इसकी उपयोगिता इस अर्थ में ज्यादा है कि आने वाली पीढ़ी को एक ऐसे पत्रकार के बारे में अनेक प्रत्यक्ष अनुभव मिलते हैं, जिसने छात्र आंदोलन से लेकर आपातकाल और फिर मुख्यधारा की पत्रकारिता तक कई महत्वपूर्ण दौर देखे.

पुस्तक का विमोचन राम बहादुर राय के 80वें जन्मदिन (25 सितंबर) पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव और वरिष्ठ पत्रकार बनवारी ने किया. कार्यक्रम में देश और प्रदेश की कई जानी-मानी हस्तियां मौजूद थीं.

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