ये कहानी है एक आदमी की… एक ऐसे आदमी की… जिसकी जिसकी शोहरत का आलम ये था कि वो एक बार कार से लुधियाना जा रहा था, साथ में कृष्ण चंदर थे, हिंदी-उर्दू के मशहूर कहानीकार… गाड़ी जब शिवपुरी के पास पहुंची तो एक सुनसान जगह पर कुछ लोग रास्ते में खड़े थे… उन्होंने गाड़ी रोकने का इशारा किया… गाड़ी रुकी… कुछ ही देर में बड़ी-बड़ी बंदूके लिये हुए कुछ और लोगों ने कार को घेर लिया। बोले, “गाड़ी से बाहर निकलो” कृष्ण चंदर साहब और वो आदमी जिसकी कहानी बता रहा हूं… वो दोनों बाहर निकले… और बाहर निकलते ही… दोनों को बंधक बना लिया गया… फिर उन्हें एक सुनसान सी जगह पर ले जाया गया… कुछ देर बाद वहां एक लंबा चौड़ा सा आदमी नमूदार हुआ… सफेद बाल, सफेद दाढ़ी-मूछें…. कंधे से कमर पर बुलेट वाली बेल्ट और हाथ में एक बंदूक… ये था अपने वक्त का मशहूर डाकू… डाकू मान सिंह.. जिसे दस्यु सम्राट भी कहा जाता था… बाद में इनपर भी कई फिल्में बनी… वो बात फिर कभी… तो ख़ैर… डाकू मान सिंह ने कहा, “कौन हो तुम लोग” तो कृष्ण चंदर साहब ने कहा, “भई मैं तो राइटर हूं कहानियां लिखता हूं” उसने कुछ अजीब सा मुंह बनाया… फिर उस दूसरे शख्स की तरफ देखा… “तुम कौन हो” वो आदमी बोला, “जी मैं… मैं तो शायर हूं… और फिल्मों में गाने लिखता हूं”
“ग… अच्छा ?”… किस फिल्म के गाने लिखे हैं तुमने…
– बोले “साहब वैसे तो बहुत फिल्मों में लिखे हैं लेकिन सात-आठ साल पहले 1963 में एक फिल्म आई थी – मुझे जीने दो- वो आपने शायद देखी हो”
– वो… वो सुनील दत्त जिसमें वो डाकू बने थे?
– जी..
– अरे बिल्कुल वो तो हमीं लोगों पर बनी थी और उसमें वो गाना था… बहुत बढ़िया… अरे..क्या था.. हां -तेरे बचपन को जवानी की दुआ देती हूं, और दुआ देकर परेशान सी हो जाती हूं” आ….
साहिर ने मुस्कुराते हुए मुखड़ा पूरा किय,
“मेरे मुन्ने मेरे गुलदार के नन्हें पौधे – तुझको हालात की आंधी से बचाने के लिए
आज मैं प्यार के आंचल में छुपा लेती हूं – कल ये कमज़ोर सहारा भी न हासिल होगा
कल तुझे काटों भरी राह पे चलना होगा… ज़िंदगानी की कड़ी धूप में जलना होगा
तेरे बचपन को जवानी की दुआ देती हूं, और दुआ देके परेशान सी हो जाती हूं”
कृष्ण चंदर के एक इंटरव्यू में लिखा है कि इतना सुनते ही… डाकू मान सिंह उनके पास बैठ गया और उनका हाथ पकड़कर बोला, “आप साहिर लुधियानवी हैं?” उन्होंने हां में सर हिलाया… और डाकू मान सिंह ने उन्हें गले लगा लिया… बाकायदा उनकी दावत की और अपने साथियों से उन्हें बाहिफाज़त लुधियाना तक छोड़कर आने को कहा…. तो आज स्टोरीबॉक्स में किस्सा साहिर लुधियानवी और उनके दो सौ रुपये का…
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वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन
उसे एक खूब-सूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा
साहिर लुधियानवी की ज़िंदगी में भी ऐसे बेशुमार अफ़साने थे जिनका कोई खूबसूरत अंजाम नहीं था… सोचिए साल 1934 है… लाहौर का एक कोर्ट है… एक आठ 13 साल का बच्चा जिसका नाम अब्दुल हई है… वो अदालत के कटघरे में ख़ड़ा है… और जज उससे पूछ रहा है… “तुम किसके साथ रहना चाहते हो… अपने वालिद के साथ… या वालिदा के साथ?”
वालिद चौधरी फज़ल मोहम्मद लुधियाना के एक अमीर ज़मींदार थे, और साहिर की वालिदा सरदार बेगम उनकी ग्यारहवीं पत्नी थीं… साहिर के पैदाइश के बाद वो चाहती थीं कि चौधरी साहब उनके रिश्ते को बाकायदा कुबूल करें लेकिन चौधरी इसके लिए तैयार नहीं हुए… मां बेटे को लेकर अलग हो गयीं… इसके बाद चौधरी साहब ने लाहौर कोर्ट में बेटे की कस्टडी का केस किया… और अब वो दिन था जब जज बच्चे से पूछ रहे थे कि उसे किसके साथ रहना है। एक तरफ चौधरी साहब थे जिनके पास बेशुमार दौलत थी… सहूलते थीं, आसानियां थीं…. और दूसरी तरफ मां थी… जिसके पास मुश्किल ज़िंदगी थी, तकलीफें थीं, भूख थी, तंगहाली थी और ज़िल्लतें थीं…
उस बच्चे ने कोर्ट में पता है क्या कहा… उसने जो कहा, उसी दिन अब्दुल हई ‘साहिर लुधियानवी’ बन गया था… उसने कहा मुझे बाप की दौलत नहीं चाहिए, मैं मां के साथ रहना चाहता हूं।
उसने मां का साथ नहीं छोड़ा… और किस्मत ने उसका साथ दिया… वक्त बदला… और वो लड़का जब बड़ा हुआ तो उसने शायर के तौर पर, गीतकार के तौर पर ऐसी बुलंदी पाई कि जहां तक कम ही लोग पहुंचे हैं। लेकिन आज जो किस्सा मैं आपको बता रहा हूं… ये एक दिलचस्प किस्सा है जो जावेद अख़्तर ने सुनाया था… मैं जस का तस आपको सुना रहा हूं… मुलायज़ा फर्माएं…
तो जावेद अख़तर बताते हैं कि जिन दिनों वो स्ट्रगल कर रहे थे… तब तक साहिर साहब तो ज़माने पर छा चुके थे… लेकिन फिर भी साहिर साहब से जावेद साहब की मुलाकात थी, क्योंकि जावेद साहब के वालिद साहब जांनिसार अख़्तर से साहिर की जान पहचान रही थी… बहरहाल… साहिर वरसोवा, अंधेरी में सात बंग्ला में रहते थे… चिनॉए निवास नाम का बंग्ला था…
तो कभी-कभी … महीने में दो तीन बार … शाम के वक्त जावेद साहब उनके यहां जाते थे… हालांकि उस वक्त तक जावेद साहब की क्या ही हैसियत थी… वो तो उन दिनों एक स्टूडियो के कंपाउंड में सोते थे… घर तक नहीं था… लेकिन फैमिली बैकग्राउंड की वजह से या उनकी काबिलियत की वजह से… साहिर साहब उनसे मिलते थे…
वो इनको यानि जावेद साहब को अपना लिखा सुनाते थे… और ये जो भी इनकी राय होते थी ये बिना लाग-लगाव के कहते थे… कि भई ये कुछ ऐसे अगर कर ले… फिर वो पूछते थे… क्यों ठीक नहीं है.. ये बताते थे… सोचिए कितना बड़ा आदमी लेकिन एक नौजवान अनएक्सपीरियेंड आदमी से बात करता था.. एक रेपो बन गया था। वो जावेद साहब का नाम कभी नहीं लेते थे… हमेशा नौजवान कहते थे… आओ नौजावान… ख़ैर उन दिनों थे भी।
तो हुआ यूं कि जावेद अख़्तर को एक बार कई दिन हो गए कोई काम नहीं मिला… जेब में सिर्फ तीस रुपये बचे थे और तीस रुपये उस होटल के लिए थे जहां खाना खाते थे… तो पैसों की सख्त ज़रूरत थी… जावेद अख़तर ने कहा कि भई किससे मदद मांगे तो आदमी वहीं जाता है जिसे वो जानता है… तो ये एक दिन सुबह-सुबह पहुंच गए उनके बंग्ले… तो पहले तो साहिर साहब इसी बात पर हैरान हुए कि कोई बात है… समझ गए होंगे… देखिए जिन लोगों ने बुरा वक्त देखा होता है… वो समझते हैं दूसरे के बुरे वक्त को…
तो ख़ैर इन्हें अंदर बुलाया… चाय नाश्ता वगैरह हुआ… फिर जावेद अख़्तर ने कुछ झिझकते हुए कहा कि “साहिर साहब वो… इधर कुछ प्रॉब्लम में हूं… कई दिनों से काम नहीं मिला है… कुछ काम वगैरह दिला देते तो…” वो सुनते रहे फिर उठे और बगल में ड्राइंग रूम था… वहां चले गए….
अच्छा जावेद साहब बताते हैं कि साहिर लुधियानवी की एक आदत थी कि जब वो उलझन में होते थे तो एक छोटी सी कंघी उनकी जेब में होती थी… वो निकाल कर कंघी करने लगते थे… तो उन्होंने ड्राइंग रूम से आवाज़ दी… ये गए.. तो देखा वो एक किनारे खड़े.. आइने के सामने खड़े… कंघी फेर रहे थे… बोले, “नौजवान… कोई बात नहीं, हमने भी बुरे दिन देखे हैं… फकीर देखेगा… क्या कर सकता है…किसी से बात करेंगे…. आ… फिलहाल ये रख लो” कहकर उन्होंने मेज़ की तरफ इशारा किया… वहां कुछ रुपये रखे थे।
अब देखिए बड़ा आदमी बड़ा इसलिए होता है, कि वो आप छोटा नहीं महसूस कराता, वो चाहते तो पैसे हाथ में दे सकते थे लेकिन उन्होंने मेज़ पर रखे… ताकि देते वक्त आंखे ना मिलानी पड़ी… शराफ़त इसको कहते हैं… बड़प्पन … अब कहां होते हैं ऐसे लोग…
ख़ैर… जावेद अख़तर बाहर गए… देखा तो दो सौ रुपये थे। दो सौ रुपये उस ज़माने में बहुत थे… महीना दो महीना आराम से गुज़र सकता था…
तो बहरहाल जावेद साहब आ गए फिर इत्तिफाक हुआ कि उन्हें कहीं काम मिल गया… फिर सलीम साहब से मुलाकात हो गयी… फिर सिप्पी फिल्म्स में काम मिल गया… वहां राजेश खन्ना से मुलाकात हो गयी… गाड़ी चल पड़ी… वक्त गुज़रता रहा, महीने साल में बदलें… फिल्में मिलने लगीं… ज़ंजीर सुपहिट हो गयी… … तो long Story short अब सलीम-जावेद फिल्म इंडस्ट्री में एक बेहद हिट राइटर्स बन गए… इतने hit कि कई इन दोनों को फिल्म के हीरो से ज़्यादा फीस मिलती थी। अब पार्टियों में सलीम-जावेद जाने लगे, बड़े-बड़े लोगों के साथ उठना बैठना हो गया… औऱ वही साहिर साहब जिन्होंने कभी 200 रुपये उधार दिये थे अब वो जावेद अख़्तर के साथ काम करने लगे… दीवार में स्क्रिप्ट सलीम जावेद की… गाने साहिर साहब के…. त्रिशूल में भी ऐसा ही… जावेद साहब की स्क्रिप्ट साहिर साहब के गाने… काला पत्थर में भी ऐसा ही था… तो अब वक्त बदल गया था… साथ उठना बैठना हो गया… साथ में नैरेशन होती थी… बातचीत होती थी… अब ज़रा बराबरी की बात हो गयी… तो ऐसे में जावेद अख़्तर मज़ाक में उन्हें छेड़ते थे कि भई “साहिर साहब आपके वो 200 रुपये अब भी मेरे पास हैं, और दे भी सकता हूं… लेकिन दूंगा नहीं”
तो साहिर साहब भी मुस्कुराते हुए कहें कि “कोई बात नहीं, वो तो मैं ले ही लूंगा”
– मैं दूंगा ही नहीं
– मैं ले ही लूंगा…
इस तरह बात हो तो बाकी लोग थोड़ा पूछते भी थे कि भई कौन से दो सौ रुपये तो ये साहिर बताना भी नहीं चाहते थे… कहते “अरे भई इनसे ही पूछिए…”
ख़ैर… वो दिन भी गुज़रे…. वक्त चलता रहा और फिर साल आ गया 1980 अक्तूबर का महीना तारीख 25 … शाम का वक्त… जावेद अख़्तर के पास एक फोन आया… साबिर दत्त का… साबिर दत्त एक साहब थे, साहिर साहब के साथ ही रहते थे.. पर्सनल एसिस्टेंट थे… शेरो-शायरी का शौक भी था… उनका एक शेर शायद आपने सुना हो – “मुद्दतों बाद उठाए थे पुराने काग़ज़ – साथ तेरे मिरी तस्वीर निकल आई है”… तो बहरहाल इन्हीं साबिर दत्त बहुत क्लोज़ थे इनके… तो साबिर दत्त का फोन आया जावेद अख़्तर के पास… और उन्होंने ख़बर दी कि साहिर साहब नहीं रहे। उनके फैमिली डॉक्टर थे डॉ कपूर इत्तिफाक से उन्हीं के घर में बैठे थे जब साहिर साहब को दिल का दौरा पड़ा और वो गुज़र गए…
ये खबर सुनते ही जावेद अख़्तर भागे… बॉ़डी तब तक साहिर साहब के घर आ गयी थी… ये पहुंचे तो साहिर साहब के घर में यानि चिनाए निवास में उनकी दो बहनें थीं. साबिर साहब थे… जावेद अख़्तर के पास डॉ कपूर का फोन आया.. डॉ कपूर ने कहा, कहा कि देखिए… बॉडी तो हमने घर भेज दी है, लेकिन एक चीज़ होती है रिगर मॉर्टिस … डेड ब़ॉ़डी में अगर रिगर मॉर्टिस हो जाए तो हाथ पैर टेहढ़े हो जाते हैं, अकड़ जाते हैं… तो थोड़ा ख्याल रखिएगा.. हाथ पैर सीधे रखिएगा… तो जावेद साहब उस कमरे में पहुंचे जहां साहिर साहब की बॉडी रखी हुई थी.. वो बॉडी के पास बैठे… उनके हाथ अपने हाथ में लिय़ा और उसे सीधा करने के लिए उस पर हाथ फिराया… और सोचने लगे कि ये वही हाथ है जिसने बेशुमार नज़्में, गज़लें और गाने लिखें हैं.. इन्हों हाथों से वो वो लफ्ज़ निकले हैं कि जिन्हें करोड़ों लोग गुनगुनाते हैं… मौत भी क्या शय ही कि अब कुछ भी नहीं… ख़ैर जावेद साहब पूरी रात वहीं बैठे रहे… और बैठे-बैठे सो गए…सुबह आंख खुली… तो बीआर चोपड़ा साहब और दूसरे तमाम बड़ी शख्सियत वहां मौजूद थीं. बॉडी को कफन पहनाया गया… कब्रिस्तान ले गए… इनकी दो बहनें थीं और तो कोई था नहीं… अब तो वो भी नहीं हैं… उनका दुनिया में कोई नहीं है.. सोचिए क्या अजीब बात है कि इतना बड़ा आदमी, इतना मशहूर और आज कोई नहीं है जो उनका अपना हो… लेकिन ख़ैर फिल्म इंडस्ट्री के लोग तो थे ही वहां कब्रिस्तान में जो भी थे… सबकी मौजूदगी में उन्हें दफनाया गया… सबने उनके लिए दुआ की… और फिर कुछ देर के बाद सब लौट गए… जावेद अख़्तर काफी देर तक कब्र के पास बैठे रहे… याद करते रहे… पर ख़ैर… अब जाने वाला जा चुका था… तो वो भी किसी तरह उठे और कब्रिस्तान से बाहर आने लगे… कार के पास पहुंचे… दरवाज़ा खोला… बैठने ही वाले थे कि किसी ने आवाज़ दी… एक वाजिदा तबस्सुम नाम की उर्दू राइटर थीं… बहुत मशहूर उनके हस्बैंड थे अशवाक… तो अशफाक साहब थे… उन्होंने आवाज़ दी थी… जावेद अख़तर ने पलट के देखा… तो अशफाक साहब बिल्कुल सुबह वाले कपड़ों में… वो जो स्लीपंग सूट होता है… उसी को पहने हुए… कहने लगे “अरे जावेद साहब वो… मुझे तो जैसे ही पता चला मैं ऐसे ही भागा चला आया… और वो… कुछ पैसे हैं आपके पास…”
इन्होंने कहा, “क्यों क्या हुआ…” बोले… “अरे वो कब्रिस्तान के लोग जो कब्र बनाते हैं… उनको पैसे देने हैं…”
जावेद साहब ने अपने कुर्ते की जेब में हाथ डालते हुए कहा, “अच्छा, कितने रुपये चाहिए?”
उन्होंने कहा… “200 रुपये”
—- समाप्त —-
