भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो चमक-धमक वाली दुनिया से दूर अपनी एक अलग ही लकीर खींचते हैं. महान और बेबाक मलयालम फिल्ममेकर जॉन अब्राहम उन्हीं में से एक हैं. जॉन सिर्फ एक डायरेक्टर नहीं, बल्कि एक विद्रोही कलाकार थे, जिन्होंने व्यावसायिक सिनेमा के बने-बनाए ढर्रे को तोड़कर ‘न्यू इंडियन सिनेमा’ की नींव रखी. अब 79वें कान्स फिल्म फेस्टिवल 2026 के वर्ल्ड प्रीमियर शो में शनिवार को जॉन अब्राहम की सबसे चर्चित मलयालम फिल्म ‘अम्मा अरियान’ का प्रदर्शन होगा.
पुणे के FTII से गोल्ड मेडल जीतने वाले जॉन का मानना था कि फिल्म बनाना कोई ऐसी चीज नहीं जो सिखाई जा सके, बल्कि यह तो अंदर से आने वाली एक कला है. उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी एक घुमक्कड़ की तरह बिताई और सुख-सुविधाओं को ठोकर मारकर आम आदमी की आवाज को पर्दे पर उतारा. भले ही उन्होंने अपने पूरे जीवन में केवल चार फिल्में बनाईं, लेकिन वे चारों फिल्में आज भी सिनेमा के छात्रों के लिए किसी बाइबिल से कम नहीं हैं.
जब एक गधे के जरिए समाज को दिखाया आईना
जॉन अब्राहम की सबसे चर्चित फिल्मों में से एक 1977 में आई तमिल फिल्म ‘अग्रहारथिल कझुथाई’ (ब्राह्मणों की बस्ती में गधा) है. जैसा कि नाम से ही साफ है, फिल्म की कहानी एक नवजात गधे के इर्द-गिर्द बुनी गई है, जिसे एक प्रोफेसर पालने का फैसला करते हैं. फिल्म बड़े ही व्यंग्यात्मक और हास्यपूर्ण तरीके से दिखाती है कि कैसे गांव वाले पहले तो उस गधे का जमकर विरोध करते हैं, लेकिन उसकी मौत के बाद उसे ‘चमत्कारी’ मानकर पूजने लगते हैं. यह फिल्म समाज में गहरे तक धंसे अंधविश्वास और पाखंड पर करारा प्रहार करती है. साढ़े चार दशक बाद भी यह फिल्म उतनी ही प्रासंगिक है जितनी तब थी. इसे ‘बेस्ट फीचर फिल्म’ का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था.
भीख मांगकर बनाई देश की पहली ‘क्राउड फंडेड’ फिल्म
सिनेमा को बाजार की ताकतों और बड़े प्रोड्यूसर्स के चंगुल से आजाद कराने के लिए जॉन ने 1984 में ‘ओडेसा कलेक्टिव’ की शुरुआत की. उनका मकसद था कि फिल्में जनता के सहयोग से बनें और जनता के लिए ही हों. इसी सोच के साथ उन्होंने अपनी फिल्म ‘अम्मा अरियान’ (माँ को संदेश) के लिए एक अनोखा रास्ता चुना. वे अपनी टीम के साथ गांव-गांव घूमे, ढोल बजाए, नुक्कड़ नाटक किए और लोगों के सामने एक बाल्टी फैला दी. गरीब किसानों और अनपढ़ ग्रामीणों ने अपनी हैसियत के हिसाब से जो चंदा दिया, उसी पैसे से भारत की पहली ‘क्राउड-फंडेड’ फिल्म तैयार हुई. यह जॉन का लोगों के प्रति अटूट विश्वास ही था जिसने उन्हें फिल्म निर्माण की एक नई परिभाषा गढ़ने की ताकत दी.
परंपरा और आधुनिकता का बेजोड़ टकराव
जॉन अब्राहम का सिनेमा हमेशा से विवादित विषयों और लीक से हटकर कहानियों के लिए जाना गया. उन्होंने ऋत्विक घटक जैसे दिग्गजों से सिनेमा की बारीकियां सीखी थीं और मणि कौल जैसे निर्देशकों के साथ काम किया था. उनके लिए फिल्म की तकनीक से ज्यादा जरूरी वो संदेश था, जो वे समाज तक पहुंचाना चाहते थे. उनकी फिल्मों में अक्सर परंपरा और आधुनिकता के बीच का टकराव देखने को मिलता है. वे व्यवस्था के उन हिस्सों पर चोट करते थे जो कमजोरों के शोषण को जायज ठहराते थे. उनके भतीजे प्रदीप चेरियन बताते हैं कि जॉन की सबसे बड़ी ताकत आम लोगों के साथ उनका सीधा जुड़ाव था, जिसने युवाओं की एक पूरी पीढ़ी को प्रेरित किया.
मलयालम सिनेमा पर छोड़ी अमिट छाप
महज 50 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह देने वाले जॉन अब्राहम ने मलयालम सिनेमा को जो दिया, उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता. उनकी कहानियों में पलायन, आत्म-खोज और व्यवस्था के प्रति विद्रोह की झलक मिलती है. ‘विद्यार्थिकाले इथिले इथिले’ से शुरू हुआ उनका सफर ‘अम्मा अरियान’ तक आते-आते एक आंदोलन में बदल गया था.
अम्मा अरियान’ की कहानी एक मरे हुए नक्सली युवा के दोस्तों के इर्द-गिर्द घूमती है, जो उसकी मां को खबर देने के सफर पर निकलते हैं. यह फिल्म आज भी सामूहिक चेतना को जगाने वाली एक बेहतरीन राजनीतिक फिल्म मानी जाती है. जॉन भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी फिल्में और उनके विचार आज भी बागी फिल्मकारों का मार्गदर्शन कर रहे हैं.
कान्स में अम्मा अरियान का प्रीमियर
तकनीकी रुप से अम्मा अरियान सिनेमाघरों में कभी रिलीज नहीं हुई. लेकिन अब जॉन अब्राहम की मृत्यु के लगभग 40 साल बाद इस फिल्म के रिस्टोर किए गए 4K वर्जन को दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित कान्स फिल्म फेस्टिवल 2026 में प्रीमियर के लिए चुना गया है. इस फिल्म की खास बात ये है कि ‘कान्स क्लासिक्स 2026’ सेक्शन में वर्ल्ड प्रीमियर के लिए चुनी जाने वाली ये एकमात्र भारतीय फीचर फिल्म है.
अनुराग कश्यप ने क्या कहा?
बता दें कि कान्स फिल्म फेस्टिवल में सिर्फ दो इंडियन फिल्मों का प्रीमियर होगा. एक शॉर्ट फिल्म ‘शैडोज ऑफ द मूनलेस नाइट’ और रीस्टोर की गई फिल्म ‘अम्मा अरियान’. सुचरिता त्यागी से बात करते हुए अनुराग कश्यप ने कहा, ‘कान्स फिल्म फेस्टिवल में इंडिया से ऑफिशियल सिर्फ ये ही दो फिल्में हैं. बाकी सारी फिल्में मार्केट में जाती है. मार्केट में कोई भी फिल्म जा सकती है. आप भी अपनी कोई फिल्म लेकर जा सकते हैं. इसके लिए आपको पैसे देना पड़ेगा. हालांकि ऐसी फिल्मों का ऑफिशियल सिलेक्शन नहीं होता है और आपको ऑडियंस में इंडियंस ही मिलेंगे.’
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