एक ज़माना था कि मैं भी एक इज़्ज़तदार आदमी समझा जाता था… नौकरी अच्छी, घर अच्छा, कपड़े भी बीवी के पसंद के साफ सुथरे… मतलब ज़िंदगी ठीक-ठाक थी… तो मेरे दोस्तों ने कहा… कि भई अगर आप इतने खुशहाल हैं… तो फिर आप के पास एक कार होनी चाहिए…
लेकिन साहब, कार खरीदने के लिए चाहिए होते हैं… पैसे वगैरह…. तो वगैरह का इंतज़ाम तो था मेरे पास.. पैसे का नहीं था। अच्छा कार के बारे में कभी इस तरह सोचा भी नहीं था लेकिन बीवी और बच्चे करने लगे ज़िद… कि गाड़ी तो चाहिए… तो भाई साहब हमने कर दिया – एक गुनाह… गुनाह ये कि इरादा कर लिया…. पुरानी कार खरीदने का। बस भैय्या वो दिन था… और आज का दिन है… न कार ढंग से चली, न हम रुके … सुनाते हैं मशहूर राइटर भरत चंद खन्ना साहब की लिखी कहानी – मेरी शामत आई जो पुरानी कार खरीदी…
इसी कहानी को YOUTUBE पर देखने के लिए यहां क्लिक करें
अगर सिर्फ पढ़ना चाहते हैं तो यहां से पढ़ें:
तो भैय्या… इधर हमने फ़ैसला किया कि पुरानी कार खरीदेंगे और उधर एजेंटों ने हमें घेर लिया… उनमें से एक साहब जान पहचान के थे… ये जान पहचान वालों से दूर ही रहना चाहिए, और खासकर अगर वो जान पहचान आपके ससुराल के तरफ की है… तो जो साहब मेरी ससुराली रिश्तेदार थे और पुरानी कारों का काम करते थे… इतवार की सुबह वो कार लेकर घर आ गए… कहने लगे… भैजान… देखिए आप… बस देखिए… थोड़ी देर तो देखिए आप… क्या चीज़ है ये… हमने देखा.. और कहा, “क्या चीज़ का क्या मतलब, कार है, साफ दिख रही” कहने लगे “यही तो बात है… ये कार नहीं है, ये बेहतरीन कार है…एक हाथ की चली है… और ऐसी कार मिलेगी नहीं इस दाम में… देखिए देखिए”
अब सही बताएं तो हमने जब कार देखी… तो कार कम कबाड़ा ज़्यादा लगी… लेकिन फिर उन्होंने कहा, कि देखिए दूल्हाभाई ऐसा है कि गाड़ी एक हाथ की चली है, ऊपर का जो भी मामला है बोनट, लाइट… ये सब पुराना है, लेकिन इंजन लोहा लाट है… और मेन चीज़ होती है इंजन। बाकी सब तो धीरे-धीरे बदल ही जाएगा… इसके बाद जो उन्होंने हमें कीमत बताई… तो वो वाकई बहुत कम थी।
मुझे उनकी ईमानदारी अच्छी लगी, साफ-साफ बता दिया कि भई बीस साल पुराना मॉडल है… चूलें ढीली, तीस से ऊपर चलाने पर सारे पेंच हिलते हैं, स्टीयरिंग तिरछी है तो आप कार तिरछी चलाएंगे तो कार सीधी चलेगी… सामने का लाइट ऊपर नीची है… हार्न कभी-कभी नहीं बजता है, इंडिकेटर लाइट का बटन दबाओ तो वाइपर चलने लगता है… और हां एक साथ में डिक्की में रखा बड़ा सा पत्थर रखा है…
मैंने कहा “पत्थर क्यों”
बोले, “गाड़ी में हैंड ब्रेक खराब है… तो कभी ढलान पर खड़ी करें तो ये टायर के नीचे ये खोंस दें, एहतियातन” …. “लेकिन भाई साहब इंजन लोहा लाट है.. एक हाथ की चली गाड़ी है”
देखिए कसम खुदा की बताएं तो हमारी हैसियत थी नहीं गाड़ी लेने की… लेकिन जो कीमत उन्होंने बताई.. वो सुनकर हमें लगा कि ये तो मोटरसाइकिल से कुछ ज़्यादा है… मतलब… इतने में अगर गाड़ी सिर्फ चलती रहे… तो भी क्या नुकसान है… औऱ कहने को कार वाले हो जाएंगे.. बीवी बच्चे खुश, खानदान वाले जलेंगे…. घर के नौकर और मोहल्ले वालों पर पर रौब अलग… तो बहुत ज़्यादा सोचा हमने इस बारे में… यानि पूरे दस मिनट… और फिर सौदा कर लिया…
तो भाई साहब… अब हम हो गए गाड़ी वाले… अब हम कार दफ्तर आने जाने लगे… और वैसे ही बातें करने लगे कि “अरे यार ये बाइक वाले बहुत खराब चलाते हैं” कुछ दिन बहुत मज़े में कटे लगा कि हम अपग्रेड हो गए हैं।
एक आध महीने के बाद एक दिन जब हम पेट्रोल डलवाने के लिए निकले… कार में बैठे… चाभी लगाई इक्सिलेरेटर दबाया… घर-घर की आवाज़ हुई। इंजन में एक दो मर्तबा जान पैदा हुई किसी ज़िबह किए हुए मुर्ग़ की फड़फड़ाहट और फिर मौत की लंबी ख़ामोशी! फिर कोशिश की…ऐसा लग रहा था जैसे कोई मुर्दे को बिजली का झटका दिया जा रहा हो..
“अरे साहब वो… ठंडी पड़ गयी” मेरे नौकर ने दिल रखने के लिए कहा “असल में ओस बहुत हुई ना.. वैसे गाड़ी बुरी नही है, एक हाथ की चली गाड़ी है। बैठिये, हम धक्का देते हैं, बैठिये” उसने कुछ और लोगों को बुलाया धक्का दिया…सड़क पर ज़ोर का एक झटका लगा और गाड़ी… ऐसे स्टार्ट हुई जैसे पानी डालने पर कोई होश में आता है।
“हो गयी.. ए … ए .. हो गयी” बदतमीज़ नौकर खुशी से नाचने लगा… मुझे बहुत बेइज़्ज़ती लगी.. और भई गाड़ी स्टार्ट तो हो ही जानी थी। मुहल्ले वाले हंस रहे हैं कि अभी लाए हुए महीने का न हुआ और धक्का दिया जा रहा है। ख़ैर, मैं….स्टीयरिंग ऐसे संभाले जैसे हवाई जहाज़ चलाने जा रहा… मैंने नाचते नौकर को “ऐ भक्क… चलो जा कर देखो अंदर क्या काम है.. नाच रहा है बेवकूफ” और फिर खिड़कियों में पर्दे के पीछे से झांक रहे पड़ोसियों को हाथ से इशारा किया… और गाड़ी चला दी।
जा तो बस पेट्रोल पंप तक रहे थे… लेकिन स्टाइल मारने में क्या दिक्कत है। अब गाड़ी आई सड़क.. ये … ये निकल रही है ये… ज़ू ज़ू बगल से ट्रक जा रहे… जान तो सूख रही… कि पता नहीं ब्रेक दबाने पर ब्रेक लगेगा कि वाइपर चलने लगेंगे। तभी फिर से गाड़ी ने झटके लिये… और बंद… लीजिए… खड़े हैं बीच रास्ते… मुंह से बेसाख्ता गालियां निकलीं. फिर दो चार लोगों को धक्के के लिए मनाया… अब बीच सड़क पर चार लोग ढकेल रहे हैं जैसे कार का जनाज़ा जा रहा… ख़ैर स्टार्ट हुई…. किसी तरह से पेट्रोल डलवाया, घर आए तो पसीने से तरबतर… बीवी ने कहा,
“हम्म… ये देखिए… गाड़ी आई कि पर लग गए… पैर ज़मीन पर ही नहीं टिक रहे हैं” अब उसको क्या मालूम कि हम पर क्या गुज़री है। हमने बताया कि गाड़ी गड़बड़ है बोलीं, “हां तुमको तो गड़बड़ लगेगी ही, हमारे खानदान के आदमी से जो ली है… गाड़ी में कोई कमी नहीं है, उसने बताया था कि एक हाथ की चली है…”
“अरे एक हाथ से चली-एक हाथ से चली.. इतनी बार सुन चुके हैं कि दिमाग खराब हो रहा है” बोलीं, “तुमको तो मौका चाहिए कमी निकालने का… सच तो ये है तुमको कार चलाना आता ही नहीं”
ख़ैर, दो चार दिन किसी तरह काटे। लेकिन कुछ ही दिनों में गाड़ी की हालत ऐसी हो गई… कि जब मैं उसे सुबह-सुबह स्टार्ट करता था… तो कमबख्त मुहल्ले के बच्चे चिल्लाने लगते थे “अरे… देखो… वो मच्छर भगाने वाली धुआं-गाड़ी फिर आ रही है” ऐसा भभक के धुंआ छोड़ती थी गाड़ी कि लगता था धुंआ छटेगा तो कोई जिन नूमेदार होगा और मुझे दो कंटाप मारेगा कि ये गाड़ी क्यों ली।
भाई साहब, ऐसी अनोखी अलिफ लैला गाड़ी थी पूछिये मत… उसकी खूबियां तो अब पता चलीं मुझे… ब्रेक अभी लगाओ तो सौ मीटर दूर जाकर रुकती थी… और ये तो कुछ नहीं, कहीं सड़क पर स्पीड ब्रेकर आ जाए तो झटका लगते ही अगला बोनट खुल के खड़ा हो जाता था… अब अंदाज़े से गाड़ी किनारे लगाओ… हार्न बहुत कम-सुखन था.. अभी दबाओ तो तीन गली बाद जाकर बड़ा मुख्तसर सा पीं.. ऐसे बजता था… जितनी देर चलाते थे उस आदमी को गाली देते थे जिसने ये गले में बांध दी थी। एक दिन तो गज़ब हो गया… मैं दफ़्तर जा रहा था ग़ौर किया… कि अगल-बगल से निकलने वाले लोग… कुछ इशारा करके जा रहे हैं… हमने सोचा अब क्या हो गया… चल तो रही है यार… एक्सपेक्टेशन इतनी कम थी गाड़ी से कि बस चल रही होती थी तो लगता था सब सही है। ग़ौर किया तो कुछ जलने की महक आ रही थी… नीचे झांक कर देखा भाई साब तो अगले टायर के पास से चिंगारियां निकल रही थीं… “अरे, ये क्या हो गया?” मैंने एकदम से गाड़ी रोकी तो देखा कि टायर जलने लगा था। शायद कहीं रगड़ लग रही थी… रिम तप कर लाल हो गया था। लोग जमा हो गए… एक साहब बोले, “भैय्या ये क्या मौत का कुआं में चलाते थे पहले” हमने कहा “चले जाओ… नहीं यही गाड़ी चढ़ा देंगे ऊपर”… बोले, “अरे कैसे चढ़ाओगे, स्टार्ट हो जाएगी?” सब तफ़रीह ले रहे थे। लेकिन एक आदमी कुछ शरीफ टाइप के लगे, शायद किसी मोटंर इंश्योरेंस कंपनी में काम करते थे… उन्हें गाड़ियों की अच्छी जानाकारी थी। आगे आए, शराफत से थोड़ी देर देखा, फिर बोले “असल में भाई साहब इसमें… क्या है कि… ब्रेक कस गए हैं… समझ लीजिए कि आप ब्रेक लगी-लगी गाड़ी चला रहे है इसलिए टायर रगड़ रहे हैं”
हमने पूछा, “तो अब क्या करें इसमें”
बोले, “वैसे मेरा ख्याल तो ये है कि आप ऐसा कीजिए कि… इसका पेट्रोल निकालिये और इसी पर छिड़क कर आग लगा दीजिए”…. वैसे तो मैं शरीफ घराने से ताल्लुक रखता हूं… लेकिन उस दिन मैंने उस इंश्योरेंस वाले के खानदान वालों की शान में कसीदे पढ़े।
ख़ैर, घड़ी पर नज़र डाली दफ्तर का टाइम हो रहा था तो हमने गाड़ी वहीं छोड़कर बस पकड़ी और दफ़्तर पहुँच गया। वहाँ से अपने कारख़ाने वाले दोस्त को संदेश भेजा। उसने क्रेन-व्रेन से गाड़ी उठवाई… पूरा दिन दफ्तर में इसी दुकदुकी में बीता कि पता नहीं क्या हो रहा होगा गाड़ी… ख़ैर शाम को मैं मैकेनिक के कारखाने पहुंचा… तो उसने बताया कि एक हफ्ता लगेगा…
मैंने कहा, “एक हफ्ता?” बोला “जी भाई, काम इतना है”
मैंने पूछा, “एक हाथ की चली गाड़ी में इतनी कमियां आ गयीं?” कहने लगे “हॉर्न के तारों में शॉर्ट सर्किट है… बैट्री बिल्कुल खत्म, कमानी तिरछी है, दरवाज़े लॉक नहीं होते… स्टीयरिंग तिरछी है.. सीट में खटमल हैं.. बोनट सीधा करना है”
“चलिए, अब जो है, कीजिए” तो साहब एक हफ़्ते तक गाड़ी कारख़ाने में रही। और फिर मोटे बिल के साथ वापस आई। अब गाड़ी सही चल रही थी… लग रहा था कि दुनिया बहुत अच्छी हो गई है।
लेकिन एक दिन फिर चलते-चलते फैन बेल्ट टूट गई। चेक किया तो प्लग में तेल भी था… अबकी मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ… मैं गाड़ी वहीं छोड़कर गुस्से में उसी कारखाने पहुंचा… दनदनाता हुआ… और ज़ोर का चिल्लाया… “अबे हो मिस्त्री ये क्या रिपेयर किया है, दो दिन न चली ढंग से”
ग़ौर से देखा… भाई साहब तो कारखाने के मालिक वाली कुर्सी पर वही कमबख्त बैठा था जिसने मुझे गाड़ी बेची थी.. ये कहकर कि बड़ी अच्छी, एक हाथ की चली है।
मैंने कहा, “तुम यहाँ?”
बोले, “हां जी अपनी ही गराज है, वो छोटा भाई है जो कुछ दिन से बैठ रहा था… बताइये,”
मैं चिल्लाया, “ये क्या कबाड़ा पकड़ा दिया है तुमने, खून पी रही है”
बोला, “अरे सर देखिए मैंने आपको बताया था एक हाथ की चली है। बाकी सब ढीला-ढाला है लेकिन इंजन लोहा लाट है…”
“अबे तो इंजन ही दे देते मुझे कपड़े में लपेट के”
“हेहेहे अरे सर, अब गाड़ी चलती है तो थोड़ा-बहुत खर्चा आता ही है… और धीरे धीरे नयी होती जा रही है… अब देखिए.. आज इसकी फैन बेल्ट नई हो जाएगी… फिर किसी दिन इसके वाइपर बदल जाएंगे… धीरे-धीरे नई होती जा रही गाड़ी.. ख़ैर और बाजी ठीक हैं?”
अब तो फंस ही गए थे। गाड़ी में फिर पैसा लगाया। अबकी जब गाड़ी रोड पर आई… तो साहब अजीब सी भें-भें आवाज़ आ रही थी… इतनी कि बाज़-मर्तबा कार की आवाज़ सुनकर गोद के बच्चों को माओं की छातियों से चिमटे हुए देखा मैंने।
मेरी अपनी हालत ये थी कि बावजूद गाड़ी होने के महीने में तीन हफ़्ते बस पर दफ़्तर जाता था। कार की सवारी में ज़्यादा रास्ता उसको धकेल कर तय करना पड़ता था। कपड़े हमेशा गंदे रहते हैं। कोई खाने पर बुलाता तो मैं शाम की चाय पर पहुंचता था। रात की दावत क़बूल करने की मैंने जुर्रत नहीं की नहीं। एक दिन मुझे इतना गुस्सा आया कि फैसला कर लिया कि ये गाड़ी बेच दूंगा… इश्तिहार लगा दिया… बहुत लोग आए… और थू-थू करके लौट गए… बोले ये गाड़ी नहीं, लोहे का कफ़न है… मैं थक हार कर उसी मैकेनिक के पास पहुंचा… जिससे खरीदी थी… और फिर वही इसे रिपेयर करता था… जो मेरी तनख्वाह मे बराबर का हिस्सेदार बन गया था। आधी तनख्वाब वही ले जाता था हर महीने…
“अख्खा… आइए… दूल्हा भाई… गाड़ी बढ़िया चल रही?” अब क्योंकि मुझे बेचनी थी। मैंने कहा, “अरे चकाचक… बढ़िया… लेकिन भाई अब निकालना चाहते थे”
क्यों
असल बहुत अच्छी, इतनी अच्छी की आदत नही है
“हां तो ठीक है, मुझे ही बेच दीजिए… बस एक मिनट रुक जाइये.. मेरे एक ससुराली रिश्तेदार आए हैं… उनको निपटा लूं… आप बैठिये”
कहकर वो गया। मैंने देखा कि वो जाकर एक अधेड़ उम्र के आदमी से बड़े जोश से मिला। अच्छा, ये जो आदमी थे। बेचारे, इनका एक हाथ नहीं था, किसी एक्सिडेंट में शायद या कुछ होगा… माज़ूर थे… बड़ा अफ़सोस लगा मुझे…
कुछ देर बाद वो वापस आए बोले, “जी तो बताइये”
मैंने कहा, “बस जी ही भर गया… वरना गाड़ी तो लोहा लाट है… जो दे दीजिए, रख लूंगा”
बोला, “अरे ऐसे कैसे… आप अपने हैं… हमाए दूल्हाभाई हैं… चलिए आप ऐसा कीजिए.. जो रकम आपने मुझे दी थी… उसकी आधी लौटा देता हूं… गाड़ी यहीं छोड़ जाइये”… मैंने कहा, “अरे.. पर इतना तो मैं लगा चुका हूं” बोले, “भई, पुर्ज़ों की कीमत अलग से नहीं लगती… और वैसे भी इतने दिन गाड़ी के मज़े भी तो लूट लिये… अभी तो आधी कीमत मिल भी रही है… कुछ दिन बाद कबाड़ में कटेगी”
मैनें कहा, “लेकिन इंजन तो लोहा लाट है”
बोले, “तो इंजन के पैसे दे तो रहा हूं”
मैंने कहा, “एक हाथ की चली गाड़ी है”
बोले, “एक हाथ की नहीं है…. आप से पहले सात लोग चला चुके हैं इसको”
मैंने कहा, “हैं तुमने ने तो कहा था कि एक हाथ की चली है..”
बोले, “ग़लत थोड़ी कहा था” फिर वो साहब जो हाथ से माज़ूर थे… उनकी तरफ इशारा करके बोले, “वो देख रहे हैं… आप से पहले गाड़ी इनके पास थी… तो ये एक ही हाथ से चलाते थे”
लंबी खामोशी…. थोड़ी देर के बाद मैं… शहर के एक बस स्टॉप पर खड़ा था… आंखो में आंसू थे, खुद भी हंसी भी आ रही थी… लेकिन सुकून था कि अब हर महीने की मेरी तनख्वाह सिर्फ मेरी है।
—- समाप्त —-
