“मुझे कोई भी बात फोन पर नहीं बताई गई कि सुनो प्रतीक हमले का दिन ये होगा, या इस वक्त हम उन पर हमला करने हैं. हम दुश्मन को हर हाल में चौंकाना चाहते थे. मुझे अपने एक ब्रिगेडियर लेवल ऑफिसर को दिल्ली भेजना पड़ा. चीफ ने खुद उनको चिट दी थी. उन्होंने कहा- इसे खोलना मत. तुम बस इसे आर्मी कमांडर को दे देना. और वो इसे खुद खोल लेगा. 6 तारीख को मुझे वो टाइम पता चला और मैंने वो सबसे छिपा कर रखी.”
अत्यंत सीक्रेसी भरे जंग की ये दास्तान है ऑपरेशन सिंदूर की. इतना गुप्त कि एक हाथ की मूवमेंट की खबर दूसरों को नहीं होती थी. टेंशन को अपर लिमिट तक ले जाने वाली, सांसें थमा देने वाली, खून जमा देने वाली इस कहानी सुना रहे हैं भारतीय सेना तेज-तर्रार चौकन्ने ऑफिसर लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा.
लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा भारतीय सेना में बड़ी जिम्मेदारी संभालते हैं. ऑपरेशन सिंदूर के वक्त वे नॉर्दन कमांड के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ थे.
वो फीकी रोशनी वाले वॉर रूम. दीवारों पर लटके नक्शे, चमकते मॉनिटर्स पर लाइव सैटेलाइट फीड्स और कमरे में फैला हुआ वह भारी सन्नाटा जो सिर्फ सांसों और दिल की धड़कनों से टूटता था. आप महसूस करते हैं कि कैसे हर सेकंड घड़ी की सुइयों से भी भारी लग रहा था.
बता दें कि नॉर्दन कमांड भारतीय सेना की सात ऑपरेशनल कमांड्स में से एक है. सेना की सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील कमांड्स में से एक नॉर्दन कमांड का काम मुख्य काम पाकिस्तान के साथ नियंत्रण रेखा और चीन के साथ सीमा सुरक्षा की निगरानी है. इसके अलावा आतंकवाद विरोधी अभियान भी कमांड का मुख्य काम है.
इस कमांड का जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ होने का मतलब है उस पूरी कमांड का सबसे ऊंचा और अंतिम कमांडर. जैसे किसी बड़ी कंपनी का CEO होता है, वैसे ही नॉर्दन कमांड का GOC-in-C उस पूरे सैन्य क्षेत्र का सुप्रीम बॉस होता है.
ऑपरेशन सिंदूर की ये कहानी 15 अगस्त को डिस्कवरी चैनल पर प्रसारित की गई है. इस डॉक्युमेंट्री का नाम है ‘डीक्लासिफाइड: ऑपरेशन सिंदूर’
इस डॉक्युमेंट्री में भारतीय सेना के तीनों चीफ, ग्राउंड ऑपरेटिव्स, डिफेंस एक्सपर्ट्स के प्रत्यक्ष अनुभव शामिल हैं. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का ऑपरेशन के बाद पहला विस्तृत इंटरव्यू भी इसमें है.
इंडियन आर्मी ने हमले की टाइमिंग और टारगेट की गोपनीयता अति खुफिया बनाए रखी. रात का अंधेरा भी उतना गहरा नहीं था, जितनी उस फैसले की गोपनीयता.
…सिवाय उस गार्ड के जो चिल्लाया- जय हिंद
इतने बड़े अधिकारी होने के बावजूद लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा को हमले की तारीख का पता 6 मई की सुबह को चला. हम सब जानते हैं कि हमला उसी रात को हुआ. हालांकि भारतीय सेना लगभग 10 दिनों से इस जंग की तैयारी में जुटी थी.
लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा ने बताया, “शाम में लगभग 6 बजे मैंने सबसे कहा कि अब हम पैकअप करते हैं और हम सिर्फ ड्यूटी ऑफिसर को यहां छोड़ेंगे. और अब हम लगभग 10.30 बजे के आस-पास मिलेंगे. उस वक्त मैं चुपचाप निकलना चाहता था, इसलिए मैंने सिर्फ एक कार मंगवाई. घर में किसी को पता नहीं चला, सिवाय उस गार्ड के जिसने चिल्लाया था- जय हिंद”
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना के 3 स्टार जनरल रहे लेफ्टिनेंट जनरल और इंडियन आर्मी के तत्कालीन DGMO राजीव घई कहते हैं कि 6 और 7 मई से पहले वे बहुत देर तक मिलिट्री ऑपरेशन डॉयरेक्टरेट में रुका करते थे. पर उस खास दिन को उन्होंने बहुत सोच समझकर फैसला लिया और ऑफिस से जल्दी निकल गए. मकसद साफ था कोई कुछ भी निष्कर्ष न निकाल सके. वे शाम 7 बजे ऑफिस से निकल गए.
डीजीएमओ भारतीय सेना का वरिष्ठ अधिकारी होते हैं, वे लेफ्टिनेंट जनरल रैंक के अधिकारी होते हैं. उनका मुख्य रोल सेना के सभी सैन्य ऑपरेशन्स की प्लानिंग, समन्वय और निगरानी करना है. वह आर्मी हेडक्वार्टर्स में बैठकर सीमा गतिविधियों, आतंकवाद विरोधी अभियानों और युद्ध की तैयारियों को नियंत्रित करते हैं.
राजीव घई को भी हमले की तारीख का असल पता 6 मई को हुआ. यानी कि एक्चुअल हमले से कुछ ही घंटे पहले.
उन्होंने कहा, “6 तारीख की सुबह को हमें समझ आ गया था कि हमें उस रात को टारगेट को एंगेज करना है, हमने जो समय तय किया वो था जीरो वन, जीरो फाइव. यानी कि रात के 01 बजकर 05 मिनट पर. क्योंकि वो समय ऐसा है, जब सरप्राइज एलिमेंट सबसे ज्यादा होता है. अब मान लीजिए कि हम वी चीज दिन के समय करते हैं तो हो सकता है कि वो लोग जिनको आप उन टेरर कैंप में मारना चाहते हैं. वो कहीं बाहर हो, ट्रेनिंग के लिए गए हों.”
हमले की टाइमिंग कितनी अहम इस बात को इसकी गोपनीयता से समझिए.
सिर्फ एक इंसान को पता था और वो मैं था…
DGMO राजीव घई कहते हैं, “जब हम स्ट्राइक के और पास जा रहे थे तो मिलिट्री ऑपरेशन डॉयरेक्टरेट को भी नहीं पता था कि अब वो रात आ चुकी है. वहां पर सिर्फ एक इंसान था जिसको वो पता था और वो मैं था.”
उस दौरान सेना की कमान संभाल रहे आर्मी चीफ उपेंद्र द्ववेदी कहते हैं कि कोई नहीं चाहता था कि किसी को पता चले कि D-DAY आज है.
D-Day का मतलब उस निर्धारित दिन से है जिस दिन किसी बड़े सैन्य अभियान या हमले की शुरुआत होनी तय होती है.
राजीव घई आगे कहते हैं कि फिर एक खास टाइम पर आर्मी कमांडर को जानकारी देने के बाद मैंने अपने अपने ऑफिसर्स और मिलिट्री डॉयरेक्टरेट के स्टाफ को बताया कि आज हमले की रात है.
14 दिन की तैयारी, वो घड़ी आ चुकी थी. अब पाकिस्तान से बदला लेना था. ध्यान रहे पाकिस्तानी आतंकियों ने 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में 26 पर्यटकों की निर्ममता से हत्या कर दी थी.
ऑफिस के लिए निकलने वाला था, बेटी-दामाद आ गए
‘डीक्लासिफाइड: ऑपरेशन सिंदूर’ नाम के इस डॉक्युमेंट्री में ऑफिसर राजीव घई बताते हैं, “रात के करीब 10 बज चुके थे, मेरी बेटी और दामाद इत्तेफाक से मेरे घर पर आ गए. जब उन्हें पता चला कि मैं ऑफिस जा रहा हूं, तो उन्होंने कहा कि वे मुझे ड्रॉप कर देंगे, तब उन्होंने मुझे साउथ ब्लॉक पर ड्रॉप किया.”
इस ऑपरेशन में शामिल एक महिला फाइटर पायलट कहती दिखती हैं, “दोपहर में हमें कमांडिंग ऑफिसर और फ्लाइट कमांडर ने हमें बुलाया, हमें हमारे टारगेट बताए गए. फॉर्मेशन उसी वक्त तय की गई. हमें आगे काम शुरू करने के लिए कहा गया.”
सब सोच रहे थे एपी सिंह को बड़ौदा जाना है
एयरफोर्स चीफ एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह 6 मई की शाम की कहानी को रोचक अंदाज में बताते हैं, “मैंने पहले ही बता दिया था कि मैं आज शाम दिल्ली से बाहर जा रहा हूं. सब यही सोच रहे थे कि एपी सिंह को फ्लाइट लेकर बड़ौदा में कहीं जाना है. मैं एक एयरक्रॉफ्ट में बैठा लेकिन वो बड़ौदा कभी नहीं गया. हम एक लोकल उड़ान के बाद वापस आकर लैंड कर गए, किसी को नहीं पता था कि चीफ वापस आ चुके हैं.”
नेवी चीफ एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी बताते हैं, “मुझे अच्छी तरह से याद है कि मैंने अपने घर वालों से कहा कि मुझे कुछ काम है, मेरा इंतजार मत करना. जाहिर है कि कोई जानता नहीं था कि मैं कहां जा रहा हूं.”
तत्कालीन आर्मी चीफ जनरल उपेंद्र द्विवेदी कहते हैं कि आधी रात से जरा सा पहले मैंने अपने सहायक (ADC- Aide-de-Camp) से उसकी पर्सनल कार निकालने को कहा. मैं पिछले गेट से निकला, जिसका इस्तेमाल मैंने कभी नहीं किया था.
पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने कहा, “…तो हम सब अलग अलग रास्तों से ऑपरेशन रूम में पहुंचे. और जॉइंट ऑपरेशन रूम में सभी सर्विस चीफ मौजूद थे. और जो भी हो रहा था उसे हम सब लाइव देख रहे थे.”
स्टेज चुका था. अब तय समय का इंतजार था, उंगलियां ट्रिगर पर थीं.
तब मुझे महसूस हुआ आज स्ट्राइक होने वाली है
सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी कर्नल आशीष उप्रेती ने कहा कि रात 11.30 बजे के करीब सेना के तीनों चीफ ऑपरेशन रूम में आ चुके थे. तब मुझे महसूस हुआ कि वो स्ट्राइक आज होने वाली है.
कर्नल आशीष उप्रेती ने कहा, “बहुत सारी स्क्रीन पर लाइव फीड्स आ रही थीं. हम उन सभी फीड्स पर टारगेट को अच्छे से देख पा रहे थे. सबका ध्यान स्क्रीन पर था. मुझे एहसास हुआ कि ये एतिहासिक मूवमेंट है. सभी लोग बहुत शांत थे, सबका फोकस एक था.”
राजीव घई उस समय के टेंशन को याद करते हुए कहते हैं, “जैसा कि इस तरह कि इवेंट से पहले होता है, वो इस बार भी हुआ, मैं नर्वस फील करने लगा. जब मैं उन बहुत सारी स्क्रीन के सामने खड़ा था. क्या होगा अगर वेक्टर्स ने हिट नहीं किया, क्या होगा अगर ये कैमरा जो चित्र भेज रहे हैं, इनमें कोई खराबी आ गई. और फिर कुछ नहीं हुआ.”
घड़ी की सुई ने 7 मई 2025 को रात के 1 बजकर 05 मिनट बजाए और पाकिस्तान में प्रलय आ गया. भारत ने पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर और पाकिस्तान में 9 ठिकानों पर हमला कर आतंकियों को वहीं दफन कर दिया. इन अड्डों में मुरीदके और बहावलपुर प्रमुख थे.
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