11 सितंबर 2001 की सुबह अमेरिका में सब कुछ सामान्य था. न्यूयॉर्क में लोग रोज की तरह काम पर जा रहे थे और हजारों कर्मचारी वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की ऊंची इमारतों में अपने दफ्तर पहुंच चुके थे. लेकिन कुछ ही मिनटों में ऐसा हमला हुआ, जिसने अमेरिका ही नहीं, पूरी दुनिया को हिला दिया. चार यात्री विमानों को हाईजैक कर उन्हें मिसाइल की तरह इस्तेमाल किया गया. देखते ही देखते वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के दोनों टावर आग और धुएं में घिर गए और आखिरकार ताश के पत्तों की तरह ढह गए.
11 सितंबर 2001, मंगलवार की सुबह करीब 8:46 बजे. आसमान साफ था. तभी अमेरिकन एयरलाइंस की फ्लाइट 11 न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के नॉर्थ टावर से जा टकराई. यह बोइंग 767 विमान था, जिसमें करीब 10 हजार गैलन जेट ईंधन भरा था.
विमान ने टावर की 93वीं से 99वीं मंजिल के बीच जोरदार टक्कर मारी. 110 मंजिल की इस विशाल इमारत में अचानक एक बड़ा छेद हो गया. सैकड़ों लोगों की मौके पर ही जान चली गई और 1,300 से ज्यादा लोग टावर की ऊपरी मंजिलों पर फंस गए.
शुरुआत में टीवी पर इस घटना को देखकर लोगों को लगा कि शायद यह कोई भयानक विमान हादसा है. लेकिन सिर्फ 17 मिनट बाद जो हुआ, उससे साफ हो गया कि अमेरिका पर हमला हो चुका है.
सुबह करीब 9:03 बजे यूनाइटेड एयरलाइंस की फ्लाइट 175 ने अचानक अपना रास्ता बदला और वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के साउथ टावर से जा टकराई. करीब 60वीं मंजिल के आसपास हुई इस टक्कर के बाद जबरदस्त धमाका हुआ. आग की लपटें और जलता हुआ मलबा आसपास की इमारतों और सड़कों पर गिरने लगा.
चार विमानों को बनाया गया हथियार
इस हमले को अल-कायदा के 19 आतंकियों ने अंजाम दिया था. इनमें 15 सऊदी अरब के थे. जबकि बाकी संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र और लेबनान से थे. हमले की साजिश अल-कायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन के नेतृत्व में तैयार की गई थी.
इनमें से कुछ आतंकी एक साल से ज्यादा समय से अमेरिका में रह रहे थे और उन्होंने वहां फ्लाइंग स्कूलों में ट्रेनिंग भी ली थी. कुछ दूसरे हमले से कुछ महीने पहले अमेरिका पहुंचे थे. सुरक्षा जांच से बॉक्स कटर और चाकू जैसी चीजें पार कराकर वे चार विमानों में सवार हुए.
इन चारों विमानों को जानबूझकर ऐसे चुना गया था जो अमेरिका के पूर्वी हिस्से से कैलिफोर्निया जा रहे थे. लंबी दूरी की उड़ान होने के कारण उनमें बड़ी मात्रा में ईंधन था. इसके बाद आतंकियों ने विमानों पर कब्जा किया और उन्हें उड़ते हुए हथियार में बदल दिया.
पेंटागन भी नहीं बचा
न्यूयॉर्क में हमला जारी था और पूरी दुनिया टीवी पर यह मंजर देख रही थी. तभी तीसरा विमान अमेरिकी सैन्य मुख्यालय पेंटागन की तरफ बढ़ा. अमेरिकन एयरलाइंस की फ्लाइट 77 सुबह 9:37 बजे वॉशिंगटन डीसी स्थित पेंटागन की इमारत से जा टकराई. बोइंग 757 के ईंधन से लगी आग ने इमारत के एक हिस्से को बुरी तरह नुकसान पहुंचाया. इस हमले में विमान में सवार सभी 64 लोगों के अलावा पेंटागन के 125 सैन्यकर्मी और नागरिक मारे गए.
इधर न्यूयॉर्क में हालात लगातार बिगड़ रहे थे. सुबह 9:59 बजे साउथ टावर अचानक भरभराकर गिर गया. करीब आधे घंटे बाद, 10:28 बजे नॉर्थ टावर भी ढह गया. देखते ही देखते दुनिया की पहचान बन चुके दोनों टावर धूल और धुएं के विशाल बादल में बदल गए.
चौथे विमान में यात्रियों ने किया मुकाबला
चौथा विमान यूनाइटेड एयरलाइंस की फ्लाइट 93 था. इसे भी हाईजैक कर लिया गया था. लेकिन विमान में बैठे यात्रियों और क्रू को फोन के जरिए न्यूयॉर्क और पेंटागन पर हुए हमले की जानकारी मिल चुकी थी.
उन्हें समझ आ गया कि विमान को भी किसी बड़े लक्ष्य पर गिराया जा सकता है. इसके बाद यात्रियों ने आतंकियों के खिलाफ मुकाबला करने का फैसला किया. यात्रियों ने कॉकपिट में घुसने की कोशिश की. माना जाता है कि उन्होंने फायर एक्सटिंग्विशर का इस्तेमाल किया. आखिरकार विमान पेंसिल्वेनिया के शैंक्सविल के पास एक खेत में करीब 500 मील प्रति घंटे की रफ्तार से जा गिरा. विमान में सवार सभी 44 लोगों की मौत हो गई. माना जाता है कि इसका निशाना अमेरिकी कैपिटल या व्हाइट हाउस हो सकता था.
करीब 3 हजार लोगों की गई जान
11 सितंबर के हमलों में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और आसपास करीब 3 हजार लोगों की मौत हुई. इनमें न्यूयॉर्क फायर डिपार्टमेंट के 343 कर्मचारी, न्यूयॉर्क पुलिस के 23 अधिकारी और पोर्ट अथॉरिटी पुलिस के 37 अधिकारी भी शामिल थे. इनमें से ज्यादातर लोगों ने दूसरों को बचाने और इमारत खाली कराने की कोशिश करते हुए अपनी जान गंवाई.
उस रात राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने देश को संबोधित करते हुए कहा कि आतंकवादी अमेरिका की इमारतों को हिला सकते हैं, लेकिन अमेरिकी संकल्प की नींव को नहीं.
इसके बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान में तालिबान शासन और अल-कायदा के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया. 7 अक्टूबर 2001 को ऑपरेशन एंड्योरिंग फ्रीडम शुरू हुआ. करीब दस साल बाद, 2 मई 2011 को अमेरिकी नेवी सील्स ने पाकिस्तान के एबटाबाद में एक ऑपरेशन के दौरान ओसामा बिन लादेन को मार गिराया.
11 सितंबर का हमला आज भी दुनिया के सबसे भयावह आतंकी हमलों में गिना जाता है. उस दिन सिर्फ दो गगनचुंबी इमारतें नहीं गिरी थीं, बल्कि अमेरिका की सुरक्षा और दुनिया की राजनीति का पूरा दौर बदल गया था.
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