अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों की नाकाबंदी जारी रखी है जिसकी वजह से वहां कई देशों के नाविक फंस गए हैं. इनमें भारत के नाविक भी हैं जो मुश्किल हालात में डर के बीच जी रहे हैं. भारत के नाविक अंकित यादव करीब ढाई हफ्तों से अपने तीन साथियों के साथ ईरान के एक बंदरगाह पर जहाज में फंसे हुए हैं. अंकित के साथ भारत समेत अन्य देशों के हजारों दूसरे नाविक भी ईरानी बंदरगाहों पर फंसे हुए हैं.
अंकित ने बताया कि उनके पास राशन काफी कम है और वो टमाटर और आलू के सहारे गुजारा कर रहे हैं. ईरान में जारी युद्ध के कारण दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्गों में से एक होर्मुज स्ट्रेट पर कारोबार बुरी तरह प्रभावित हुआ है.
करीब 30 साल के अंकित एक छोटे जहाज पर सवार थे, जो स्टील लेकर ईरान, कुवैत और ओमान के बीच आवाजाही करता था. उन्होंने बताया कि अगर जहाज को ओमान जाने और वहां से भारत वापस भेजे जाने की इजाजत मिल जाती तो वो संघर्ष क्षेत्र छोड़ सकते थे, लेकिन अमेरिकी नौसेना की नाकेबंदी के कारण ऐसा नहीं हो सका.
उन्होंने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से फोन पर कहा, ‘जिस शिपिंग कंपनी के लिए मैं काम करता हूं, वो हमें यहां से जाने की अनुमति देने को तैयार नहीं है. हवाई टिकट काफी महंगा है और कंपनी इसका खर्च नहीं उठाना चाहती है. हम खुद टिकट खरीदने में सक्षम नहीं हैं. बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता सरकार की मदद है.’
नाविकों ने बताया- धमाकों के बीच कैसे जी रहे
एक अन्य भारतीय नाविक सलमान सिद्दीकी भी ईरान के एक बंदरगाह पर फंसे हुए हैं. वो कोमोरोस के झंडे वाले मालवाहक जहाज पर थे, जो ईरान से ओमान जा रहा था.
सिद्दीकी फिलहाल खुर्रमशहर बंदरगाह पर खड़े जहाज में फंसे हुए हैं. वो कहते हैं, ‘हम यहां सिर्फ यही सोचते हैं कि रात कैसे गुजरे और भगवान से दुआ करते हैं कि किसी हमले में हम निशाना न बनें. यह कुछ राहत की बात है कि युद्धविराम लागू है और अब पहले जैसी लगातार धमाकों की आवाजें सुनाई नहीं देतीं.’
भारत दुनिया के शीर्ष तीन नाविक सप्लायर देशों में शामिल है और यहां 3 लाख से अधिक नाविक काम करते हैं. जहाजों पर हुए हमलों ने नाविकों के बीच सुरक्षा चिंताएं बढ़ा दी हैं और कई लोग फिर से समुद्र में लौटने को तैयार नहीं हैं.
सिद्दीकी ने कहा, ‘हमने 100 से ज्यादा धमाके सुने हैं. जब आप मिसाइलों या गोले को उड़ते और अपने जहाज के बेहद करीब फटते देखते हैं तो बहुत डर लगता है.’
कुछ नाविकों को खाड़ी छोड़ने की मिली है इजाजत
सुरिंद्र कुमार चौरसिया उन भाग्यशाली लोगों में शामिल थे जिन्हें भारत वापस लाया गया. वो 20 अन्य क्रू सदस्यों के साथ शारजाह बंदरगाह के पास एक जहाज पर यूरिया लोड करने की मंजूरी का इंतजार कर रहे थे, तभी युद्ध शुरू हो गया.
उन्होंने कहा, ‘हम करीब चार दिनों तक फारस की खाड़ी में फंसे रहे. बाद में हमारी शिपिंग कंपनी ने ईरान से सुरक्षित रास्ते के लिए बातचीत की. इस दौरान हमने जहाजों पर ड्रोन हमले, वीएचएफ रेडियो पर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की चेतावनियां, लड़ाकू विमान और बहुत कुछ देखा.’
उन्होंने बताया कि बाद में फिर IRGC ने उनके जहाज को एक रास्ता दिया जिसके बाद जहाज ईरानी और ओमानी जलक्षेत्र के करीब से गुजरा क्योंकि दूसरी तरफ समुद्री बारूदी सुरंगें थीं.
भारत के नौवहन मंत्रालय ने कहा है कि संघर्ष शुरू होने के बाद से अब तक करीब 2,680 भारतीय नाविकों को वापस लाने में मदद की गई है. ईरान युद्ध के दौरान तीन भारतीय नाविकों की मौत हो चुकी है. वहीं 18 अप्रैल को होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने की कोशिश कर रहे भारत के झंडे वाले दो जहाजों पर IRGC ने गोलीबारी की थी.
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