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‘डिमोशन स्वीकार करने की मजबूरी’, तरुण तेजपाल केस में बॉम्बे HC ने क्यों लोअर कोर्ट के फैसले को पलटा – Tarun tejpal Journalist convicted rape 10 years of rigorous imprisonment Bombay high court case point ntcppl


बॉम्बे हाईकोर्ट ने तहलका के पूर्व पत्रकार तरुण तेजपाल को निचली अदालत से मिली सज़ा को रद्द करते हुए और उसे 10 साल की जेल की सज़ा सुनाते हुए कहा कि “काम की जगह पर यौन उत्पीड़न महिलाओं के करियर पर गहरा और लंबे समय तक रहने वाला बुरा असर डालता है. अदालत ने कहा कि यौन उत्पीड़न उन्हें ऐसी चीज़ों के लिए सज़ा देता है जिन पर उनका कोई बस नहीं होता. इसके अलावा पीड़ित को ही दोषी ठहराने का आम चलन पीड़िता को अलग-थलग कर देती हैं, जिससे वे नौकरी बदलने या डिमोशन स्वीकार करने पर मजबूर हो जाती हैं. काम की जगह का असंवेदनशील और बेपरवाह माहौल अक्सर महिलाओं में घर से बाहर निकलकर अच्छे मौके तलाशने को लेकर डर पैदा करता है, जिससे वे अपनी प्रतिभा और हुनर ​​का पूरा इस्तेमाल नहीं कर पातीं.”

जस्टिस डॉ. नीला गोखले और अमित एस. जमशंडेकर की बेंच ने कहा कि इस मामले में पीड़िता को नुकसान उठाना पड़ा, क्योंकि उसे इस्तीफ़ा देने के लिए मजबूर किया गया था और सुनवाई के दौरान उसे बहुत ज़्यादा शर्मिंदगी भी झेलनी पड़ी. 

हाई कोर्ट ने गोवा सेशंस कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसके तहत तेजपाल को बरी कर दिया गया था. कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट का पीड़िता की बात पर यकीन न करना गलत था. कोर्ट ने कहा कि पीड़िता ने सच कहा है और अभियोजन पक्ष ने तेजपाल के खिलाफ मामला हर तरह के उचित संदेह से परे साबित कर दिया है.

बेंच ने कहा, “ट्रायल कोर्ट ने तेजपाल को उन आरोपों से बरी करने में गलती की जो उस पर लगाए गए थे. ट्रायल कोर्ट का सबूतों का मूल्यांकन न केवल तर्कहीन है, बल्कि गलत भी है. ट्रायल कोर्ट के निष्कर्ष टिकने लायक नहीं हैं.”

हाई कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता के बयान पर अविश्वास करके गलती की है. कोर्ट ने यह आधार बनाया कि पीड़िता ने इस सवाल का जवाब देने से टाल-मटोल की कि क्या उसने किसी समय अपने पैर ऊपर उठाए थे (उसके कई बयानों में अंतर था), और इसे उसके सबूत में बदलाव और एक अहम विरोधाभास माना. 

ट्रायल कोर्ट ने उसके बयान को अविश्वसनीय भी माना क्योंकि पीड़िता ने यह दावा नहीं किया था कि आरोपी ने उसके कंधे या शरीर के किसी अन्य हिस्से को छुआ था. 

हाई कोर्ट ने कहा कि सेशंस कोर्ट ने गलत तरीके से यह माना कि पीड़िता का किसी NGO और कानूनी सलाहकार से सलाह लेना कहानी को मनगढ़ंत बनाने की कोशिश हो सकती है. कोर्ट ने घटना के पांच साल बाद दर्ज उसके बयान में छोटी-मोटी कमियों को भी बहुत बड़ी विसंगतियां मान लिया, जबकि सुप्रीम कोर्ट के तय नियमों के अनुसार, छोटी-मोटी कमियों से अभियोजन पक्ष का भरोसेमंद मामला गलत साबित नहीं होता. 

ट्रायल कोर्ट यह समझने में नाकाम रहा कि पीड़िता, जो एक युवा कामकाजी महिला थी, प्रतिवादी (तेजपाल) और उसके संगठन की ताकत के खिलाफ लड़ रही थी. आगे की कार्रवाई तय करने से पहले कानूनी सलाह लेना उसका अधिकार था. ट्रायल कोर्ट ने पेशेवर मदद लेने को घटनाओं में हेरफेर या नई बातें जोड़ने की संभावना के तौर पर देखा. हाई कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट का यह निष्कर्ष गलत है. 

हाई कोर्ट ने कहा कि “अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए मज़बूत मामले को ज़रूरी न्यायिक गंभीरता से परखने के बजाय, ट्रायल कोर्ट ने बहुत ज़्यादा तकनीकी बारीकियों पर ध्यान दिया, यौन उत्पीड़न के सबूतों की जांच के बारे में सुप्रीम कोर्ट की ज़रूरी गाइडलाइंस को नज़रअंदाज़ किया, और प्रतिवादी को बिना किसी ठोस आधार के ‘संदेह का लाभ’ दे दिया.”

हाई कोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट द्वारा पीड़िता के बयान और सबूतों का मूल्यांकन कई गंभीर कमियों से भरा था. ये कमियां मुख्य रूप से पहले से बनी धारणाओं के कारण थीं. इसके अलावा, कोर्ट ने उसके सहयोगियों और मां के सामने की गई बातों को संदिग्ध माना या यह कहा कि वे रेप की पुष्टि नहीं करतीं. कोर्ट ने इस बात को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया कि उसने ये बातें करीबी दोस्तों और परिवार को बताई थीं. ये कोई औपचारिक बयान नहीं था. 

हाई कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता के उस व्यवहार को भी गलत समझा, जिसमें वह पुलिस को अपना फ़ोन सौंपने के बाद कोर्ट के सिस्टम पर अपना सात साल पुराना ईमेल अकाउंट नहीं खोल पाई थी. कोर्ट ने इसे उसके अविश्वसनीय होने का संकेत माना. साथ ही कोर्ट ने बिना किसी ठोस आधार के उसके खिलाफ़ नकारात्मक निष्कर्ष निकाले. जैसे कि उसके शरीर पर कोई बाहरी चोट न होना, उसकी शारीरिक प्रतिक्रिया, या ज़बरदस्ती किस से बचने के लिए अपनी ठुड्डी न झुकाना या हमलावर को खरोंच न मारना. ऐसा करते हुए कोर्ट ने एक “आदर्श” पीड़िता के शारीरिक प्रतिरोध या भावनात्मक प्रतिक्रिया के बारे में बनी-बनाई रूढ़िवादी धारणाओं का सहारा लिया. यहां तक कि बाद में काम से जुड़े कार्यक्रमों में उसके मुस्कुराते हुए व्यवहार को भी उसके खिलाफ इस्तेमाल किया. 

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