दुश्मन की हर हलचल पर नजर… EOS-05 से बढ़ेगी भारत की सर्विलांस ताकत – eos 05 satellite launch india defence surveillance


भारत अंतरिक्ष में अपना नया अर्थ ऑब्जरवेशन सैटेलाइट EOS-05 भेजने जा रहा है. ISRO 4 सितंबर 2026 को सुबह 2:55 बजे GSLV-F17 रॉकेट से इसे श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से लॉन्च करेगा. EOS-05 का काम धरती की तस्वीरें लेना और जमीन पर हो रहे बदलावों को देखना है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट से काम करने वाला भारत का पहला इमेजिंग सैटेलाइट होगा.

यह मिशन इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि यह बड़े इलाके की तस्वीरें बार-बार ले सकेगा. इससे सीमा, समुद्री इलाकों और संवेदनशील जगहों पर समय के साथ होने वाले बदलावों को समझने में मदद मिल सकती है. हालांकि EOS-05 को सैन्य या जासूसी सैटेलाइट नहीं कहा गया है. इसका मुख्य काम धरती की निगरानी करना है.

EOS-05 को GISAT-1A भी कहा जाता है. यह भारत और आसपास के इलाकों की हाई रिजॉल्यूशन तस्वीरें देगा. इन तस्वीरों का इस्तेमाल सिर्फ सुरक्षा ही नहीं, बल्कि बाढ़, चक्रवात, जंगल की आग, खेती, जमीन और पर्यावरण से जुड़े कई कामों में भी किया जाएगा. यानी यह सैटेलाइट एक साथ कई क्षेत्रों के लिए उपयोगी साबित हो सकता है.

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डिफेंस के लिए क्यों जरूरी है EOS-05?

किसी भी सीमा की निगरानी सिर्फ एक तस्वीर से नहीं होती. सुरक्षा एजेंसियों के लिए यह जानना भी जरूरी होता है कि किसी इलाके में पहले क्या था और अब क्या बदल गया है. EOS-05 की बार-बार तस्वीरें लेने की क्षमता इसी काम में मदद कर सकती है. अगर किसी सीमा वाले इलाके में नई सड़क बनती है, कोई नया निर्माण होता है या जमीन के इस्तेमाल में बदलाव आता है, तो अलग-अलग समय की तस्वीरों की तुलना करके उस बदलाव को देखा जा सकता है. यह जानकारी दूसरी निगरानी सिस्टम के साथ मिलाकर इस्तेमाल की जा सकती है.

EOS-05 Earth observation satellite

चीन और पाकिस्तान सीमा पर कैसे मदद मिलेगी?

भारत की चीन और पाकिस्तान के साथ लंबी सीमाएं हैं. इन सीमाओं के कई हिस्से पहाड़ों और कठिन इलाकों में हैं, जहां जमीन से हर समय निगरानी करना आसान नहीं होता. ऐसे में सैटेलाइट से मिलने वाली तस्वीरें अतिरिक्त जानकारी देने का काम कर सकती हैं. EOS-05 बड़े इलाके को एक साथ देख सकेगा. इससे सीमा के आसपास होने वाले बड़े बदलावों को समझने में मदद मिल सकती है. लेकिन यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि सिर्फ एक सैटेलाइट के आधार पर कोई सैन्य फैसला नहीं लिया जाता. इसके साथ ड्रोन, रडार और जमीन से मिलने वाली दूसरी जानकारी भी देखी जाती है.

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36 हजार किलोमीटर ऊपर से करेगा काम

EOS-05 को जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट में भेजा जाएगा, जो धरती से करीब 36 हजार किलोमीटर ऊपर होती है. इस ऑर्बिट की खास बात यह है कि सैटेलाइट धरती के घूमने की गति के साथ तालमेल बनाकर एक बड़े इलाके पर बार-बार नजर रख सकता है.

यही वजह है कि EOS-05 दूसरे सामान्य अर्थ ऑबसर्वेशन सैटेलाइट्स से अलग है. यह भारत का पहला इमेजिंग सैटेलाइट होगा जो इस ऑर्बिट से धरती की तस्वीरें लेगा. GSLV-F17 रॉकेट इसे पहले तय ट्रांसफर ऑर्बिट में पहुंचाएगा, जिसके बाद यह अपनी अंतिम ऑर्बिट में काम शुरू करेगा.

समुद्र पर भी रखी जा सकेगी नजर

भारत के लिए सिर्फ जमीन की सीमा ही नहीं, बल्कि समुद्री क्षेत्र भी बहुत अहम है. हिंद महासागर और भारत के तटीय इलाके सुरक्षा के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण माने जाते हैं. EOS-05 से मिलने वाला अर्थ ऑबसर्वेशन डेटा इन इलाकों में हो रहे बड़े बदलावों को समझने में भी मदद कर सकता है.

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि यह हर सैन्य गतिविधि को पहचानने वाला सैटेलाइट है. इसका मुख्य काम धरती की तस्वीरें लेना है. इन तस्वीरों को दूसरी एजेंसियों और निगरानी सिस्टम के डेटा के साथ मिलाकर देखा जा सकता है.

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आपदा और जंगल की आग में भी होगा उपयोग

इसका इस्तेमाल बाढ़, चक्रवात और जंगल की आग जैसी आपदाओं पर नजर रखने में भी किया जाएगा. किसी इलाके में पानी कितना फैल गया या आग किस दिशा में बढ़ रही है, इसकी जानकारी तस्वीरों से मिल सकती है.

इसके अलावा जमीन, जंगल, खेती और पर्यावरण में होने वाले बदलावों को भी देखा जा सकेगा. यही वजह है कि यह मिशन भारत कीअर्थ ऑबसर्वेशन क्षमता को मजबूत करने वाला एक अहम कदम माना जा रहा है.

EOS-05 को सीधे सैन्य सैटेलाइट कहना सही नहीं, लेकिन इसकी बार-बार तस्वीरें लेने की क्षमता डिफेंस के लिए उपयोगी है. सीमा से लेकर समुद्र और आपदा प्रभावित इलाकों तक, इससे मिलने वाला डेटा कई जरूरी कामों में इस्तेमाल किया जा सकेगा. अगर GSLV-F17 का लॉन्च सफल रहता है, तो भारत की अंतरिक्ष से धरती की निगरानी करने की क्षमता एक कदम और मजबूत हो जाएगी.

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