नल लगे, लेकिन पानी कहां गया? तमिलनाडु में जल जीवन मिशन की इस रिपोर्ट ने खोली पोल – tamil nadu jal jeevan mission audit cag report water supply shortage ntc dhrj


कागजों पर आंकड़े चमका देना एक बात है और घर की रसोई में नल से पानी टपकना दूसरी बात. तमिलनाडु में जल जीवन मिशन पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की परफॉर्मेंस ऑडिट रिपोर्ट ने सरकारी दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं. राज्य में हर घर तक नल का कनेक्शन पहुंचाने का आंकड़ा 2019 में करीब 17 फीसदी था, जो 2024 तक बढ़कर 84 फीसदी के पास पहुंच गया. सुनने में यह बात जितनी अच्छी लगती है, जमीन पर हकीकत उतनी ही कड़वी है. ऑडिट में चुने गए जिलों के करीब 50 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों को हर रोज तयशुदा 55 लीटर पानी तक नहीं मिल रहा है.

योजना के नियम के मुताबिक, नियम यह था कि नल घर के भीतर यानी रसोई, नहाने की जगह या शौचालय में लगे, ताकि महिलाओं को बाहर न भटकना पड़े. जमीन पर उलटा खेल हुआ. करीब 96 फीसदी नल घरों के बाहर मुख्य चौखट पर टांग दिए गए. कई जगह पाइप तो पहुंचा, लेकिन टोटी से हवा निकल रही है.

नागापट्टिनम जिले की हालत सबसे चौंकाने वाली है, जहां ऑडिट में शामिल किसी भी बस्ती को मानक के हिसाब से 55 लीटर पानी नहीं मिला. कोयंबटूर में 100 फीसदी FHTC कवरेज बताया गया, लेकिन असल में सिर्फ 8.67 फीसदी बस्तियां ही पानी की मात्रा के मानक पर खरी उतरीं. यानी नल कनेक्शन पहुंचाने के साथ पर्याप्त पानी की सप्लाई सुनिश्चित करने में बड़ी कमी रह गई.

बेकार पड़ी पानी की टंकियां

विभागों के बीच तालमेल की कमी का असर भी साफ दिखा. गांवों में बनाई गई कुछ पानी की टंकियां और दूसरी सुविधाएं इसलिए इस्तेमाल नहीं हो सकीं, क्योंकि अलग-अलग योजनाओं के बीच सही तालमेल नहीं था. कहीं जरूरत से ज्यादा क्षमता वाले ढांचे बना दिए गए, तो जरूरत वाले इलाकों में पानी की कमी बनी रही. यानी जहां जितनी जरूरत थी, वहां उसी हिसाब से इंतजाम नहीं हो पाया.

जांच के बिना पेमेंट

पानी की शुद्धता जांचने वाली 18 लैब में जरूरी बुनियादी सुविधाओं और उपकरणों की कमी मिली. छह में से चार जिला लैब के पास वैध NABL मान्यता भी नहीं थी. पानी की जांच में जरूरी 13 मानकों को भी हर जगह पूरी तरह नहीं जांचा गया और आर्सेनिक की जांच छूट गई. गांवों में इस्तेमाल के लिए दी गई फील्ड टेस्टिंग किट भी कई जगह इस्तेमाल नहीं हुई.

रामनाथपुरम, विल्लुपुरम और सेलम में देखरेख की कमी के चलते 44 से 65 फीसदी आरओ प्लांट काम नहीं कर रहे थे. वहीं, थर्ड पार्टी एजेंसियों ने अधूरी जांच रिपोर्ट दी, फिर भी कई मामलों में कमियां दूर किए बिना भुगतान जारी कर दिया गया.

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