यूरोप में भीषण गर्मी का कहर… इटली के शहरों में रेड अलर्ट, ऑस्ट्रिया में तापमान का टूटा रिकॉर्ड – Severe heatwave wreaks havoc in Europe… Red alert in Italy, temperature record broken in Austria ntc aktw


इस वक्त पूरा यूरोप भीषण गर्मी और लू की चपेट में है. हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि इटली सरकार ने अपने सभी प्रमुख शहरों को हाई ‘रेड अलर्ट’ पर रख दिया है. इस भयंकर गर्मी की वजह से कई देशों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया है. मौसम के इस विक्राल रूप ने ऑस्ट्रिया में तापमान के सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. फ्रांस से लेकर बाल्कन तक जंगलों में आग भड़क उठी है. ट्रैफिक और बिजली व्यवस्था बुरी तरह चरमरा गई है.

इटली के स्वास्थ्य मंत्रालय ने गुरुवार को देश के राष्ट्रीय हीट सर्विलांस सिस्टम के तहत आने वाले सभी 27 शहरों को रेड अलर्ट पर डाल दिया है. इस साल ऐसा पहली बार हुआ है कि पूरा नेटवर्क एक साथ सबसे ऊंचे चेतावनी स्तर पर है.

यह अलर्ट उत्तर-पूर्व के ट्रिएस्टे शहर से लेकर दक्षिण में सिसिली के पालेर्मो तक लागू किया गया है. अधिकारियों का कहना है कि यह खतरा सिर्फ बुजुर्गों या बीमार लोगों के लिए नहीं, बल्कि हर नागरिक के लिए है. प्रशासन ने लोगों और पर्यटकों को सलाह दी है कि वे दिन के सबसे गर्म घंटों में सीधे धूप में निकलने से बचें, घरों के अंदर रहें और समय-समय पर खूब पानी पिएं.

भीषण गर्मी का असर पर्यटन पर भी साफ देखने को मिल रहा है. पर्यटकों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए पर्यटन और संस्कृति मंत्रालय ने रोम के मशहूर कोलोसियम और पैंथेन जैसे ऐतिहासिक स्थलों के खुलने के समय में बदलाव किया है.

इन जगहों पर अब शाम के वक्त घूमने की इजाजत बढ़ाई गई है. इसके साथ ही, पर्यटकों की सुविधा के लिए कोलोसियम के एंट्री गेट पर ठंडी हवा देने वाले मिस्ट फैन और मेडिकल कैंप भी लगाए गए हैं.

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ऑस्ट्रिया में गर्मी ने तोड़े सारे रिकॉर्ड

यूरोप में सबसे खतरनाक तापमान ऑस्ट्रिया में दर्ज किया गया है. जियोस्फेयर ऑस्ट्रिया के मुताबिक, स्लोवाकिया की सीमा के पास स्थित बैड डॉयच-अल्टेनबर्ग गांव में पारा 41.2 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया. देश के इतिहास में यह अब तक का सबसे ज्यादा तापमान है.

इसके साथ ही ऑस्ट्रिया बहुत गंभीर सूखे की मार झेल रहा है. इस साल जनवरी से जून के बीच देश भर में सामान्य से 27 प्रतिशत कम बारिश हुई है. मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि देश के कुछ हिस्सों में 1885 के बाद से इतनी भयानक सूखा जैसी स्थिति कभी नहीं देखी गई थी.

इस भयंकर गर्मी और सूखे का असर सिर्फ इंसानों की सेहत पर ही नहीं, बल्कि बिजली उत्पादन और परिवहन पर भी पड़ रहा है. मध्य यूरोप में नदियों का जलस्तर घटने से शिपिंग और ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हुई है. इसके अलावा, हंगरी जैसे देशों में सूखे और पानी की कमी के कारण परमाणु संयंत्रों को अपनी बिजली उत्पादन क्षमता घटानी पड़ी है.

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वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के कारण इस तरह की चरम मौसमी घटनाएं अब आम होती जा रही हैं. आने वाले दिनों में अगर हालात नहीं सुधरे, तो सरकारों और आम जनता को और भी बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है.

 

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