राहुल गांधी को सिर्फ बीजेपी ही बना सकती है ‘प्राइम-चैलेंजर’ – rahul gandhi may become prime challenger to modi in 2029 elections because of bjp only ntcpdr


2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले देश ने विपक्षी गोलबंदी का एक महा-प्रयोग देखा था- नाम था ‘INDIA’ गठबंधन. जिसके खत्म होने की घोषणा पिछले दिनों कांग्रेस से गठबंधन टूटने पर डीएमके ने की. प्रयोग बड़ा था, लेकिन इसकी सबसे बड़ी त्रासदी यह रही कि इसे कभी कोई सर्वमान्य चेहरा या नेतृत्व नहीं मिल सका. ‘विपक्ष का दूल्हा कौन बनेगा?’ यह अंतहीन कलह गठबंधन की बुनियाद को ही खोखला करती रही. लेकिन राजनीति का चक्रव्यूह देखिए, आज जैसे-जैसे विपक्षी धुरंधर बारी-बारी चुनावी बिसात पर धराशायी हो रहे हैं, राहुल गांधी को लेकर कांग्रेस का ‘डिफॉल्ट’ दावा एक बार फिर पूरी ताकत से जिंदा हो गया है.

तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी का हालिया बयान इसी नैरेटिव की बानगी है. उन्होंने राहुल गांधी को 2029 का ‘प्राइम-चैलेंजर’ घोषित कर दिया है. रेवंत की थ्योरी दिलचस्प है. वे लेफ्ट और क्षेत्रीय क्षत्रपों की हार में कांग्रेस की जीत देख रहे हैं. विडंबना देखिए, ये वही दल हैं जो कल तक ‘INDIA’ गठबंधन में कांग्रेस के साझेदार थे, और आज अपने-अपने राज्यों में बीजेपी के चक्रव्यूह में फंसकर दम तोड़ रहे हैं. तो कांग्रेस संतोष महसूस कर रही है. हालांकि, परपीड़ा में कांग्रेस का सुख समझा जा सकता है. राहुल गांधी कहते रहे हैं कि क्षेत्रीय दल कांग्रेस की जमीन छीनकर ही खड़े हुए हैं. वे कभी भाजपा का मुकाबला नहीं कर सकते.

राजनीति के इस बदलते दौर में राहुल गांधी के निर्विरोध चैलेंजर बनने के रास्ते में अगर अब कोई आखिरी और सबसे बड़ी दीवार बची है, तो वे हैं अखिलेश यादव. और इस दीवार का भविष्य तय होगा 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से.

अखिलेश यादव: राहुल के लिए चुनौती भी, और सबसे बड़ी उम्मीद भी

अखिलेश यादव राहुल गांधी के लिए एक जटिल पहेली हैं. वे चुनौती इसलिए हैं, क्योंकि वे देश के सबसे बड़े सियासी सूबे, उत्तर प्रदेश के निर्विवाद नायक हैं. यह वही यूपी है जिसने 2024 में बीजेपी के रथ को रोककर उसे बहुमत से दूर कर दिया था. अखिलेश आज विपक्ष के इकलौते ऐसे नेता हैं जिनके पास कोर ‘मुस्लिम-यादव’ (MY) वोटबैंक की अचूक ताकत है, एक मजबूत संगठन है और वे सीधे योगी-मोदी की जोड़ी की आंखों में आंखें डालकर लड़ रहे हैं.

2024 में कांग्रेस को यूपी में जो भी संजीवनी मिली, उसका पूरा क्रेडिट अखिलेश के खाते में जाता है. इस कड़वे सच के बावजूद, राहुल गांधी के लिए राहत की बात यह है कि समाजवादी पार्टी ने उनके साथ कभी वह ‘अहंकार और तिरस्कार’ का रवैया नहीं अपनाया जो ममता बनर्जी ने बंगाल में दिखाया. अखिलेश खुद यूपी की सत्ता में वापसी के लिए संघर्ष कर रहे हैं, इसलिए वे दिल्ली की रेस के लिए कांग्रेस से फिलहाल कोई नया मोर्चा नहीं खोलना चाहते.

असल परीक्षा 2027 में होगी. यदि अखिलेश 2027 में यूपी फतह कर लेते हैं, तो वे राष्ट्रीय क्षितिज पर राहुल गांधी से कहीं बड़े कद के नेता बनकर उभरेंगे. लेकिन, यदि वे नाकाम रहे, तो राहुल गांधी 2029 के लिए ‘निर्विरोध चैलेंजर’ बन जाएंगे. क्षेत्रीय दलों की त्रासदी यह है कि उनकी प्रासंगिकता सिर्फ उनके राज्य की सत्ता से है, जबकि कांग्रेस के लिए ‘ब्रांड राहुल’ राज्यों की हार-जीत के नफे-नुकसान से बहुत ऊपर है. वो राष्ट्रव्यापी है.

कहां गए 2024 के ‘चैलेंजर्स’?

2014, 2019 और 2024… इन तीन आम चुनावों में बीजेपी को चुनौती देने निकला विपक्ष कभी एक सुर में नहीं बोल सका. मठाधीशों की आपसी महत्वाकांक्षाओं ने हमेशा इस एकता को तार-तार किया. पिछले चुनाव में जब नीतीश कुमार का नाम संयोजक के तौर पर आगे बढ़ा, तो ममता बनर्जी ने वीटो लगा दिया. राहुल गांधी के नाम पर कभी सहमति बन ही नहीं पाई. नतीजा यह हुआ कि बिखरा हुआ विपक्ष अपने-अपने राज्यों के किलों में सिमटकर रह गया, जिन्हें बीजेपी एक-एक करके ढहा रही है:

ममता बनर्जी: लोकसभा में तो उन्होंने टीएमसी का किला बचा लिया, लेकिन विधानसभा चुनाव की चौखट पर आते ही बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग के सामने उनकी सारी रणनीतियां धरी की धरी रह गईं. हाशिए पर खड़ी कांग्रेस को भले वहां दो सीटें मिलीं, लेकिन उसे इस बात का सुकून है कि बंगाल में अब टीएमसी का एकाधिकार खत्म हो चुका है.

अरविंद केजरीवाल: दिल्ली और पंजाब से कांग्रेस का सूपड़ा साफ करने वाले केजरीवाल का सपना ‘तीसरा विकल्प’ बनने का था. इसी महात्वाकांक्षा में उन्होंने 2014 में सीधे वाराणसी में मोदी को चुनौती दी थी. दिल्ली में 90% से ज्यादा सीटें जीतने वाली ‘आप’ जब हारी, तो बीजेपी से ही हारी. कांग्रेस आज इस गणित पर खुश हो सकती है कि आम आदमी पार्टी जो भी जमीन खोएगी, वह आखिरकार कांग्रेस की झोली में ही गिरेगी.

नीतीश कुमार: 2024 से पहले विपक्ष को एक धागे में पिरोने के लिए नीतीश कुमार ने देशव्यापी दौरे किए थे. लेकिन केंद्रीय राजनीति में उनका नेतृत्व स्थापित होने से पहले ही सहयोगियों के अविश्वास ने उनकी जमीन खिसका दी.

बैसाखियों पर खड़ी कांग्रेस और ‘परजीवी’ राजनीति

2024 में 99 सीटें जीतकर कांग्रेस ने ऐसा जश्न मनाया था, मानो देश की सबसे पुरानी पार्टी अपने पुराने वैभव में लौट आई हो. लेकिन यह भ्रम जल्द ही टूट गया. हरियाणा में जीत का हलवा तैयार था, पर कांग्रेस की आपसी गुटबाजी और बीजेपी की माइक्रो-प्लानिंग ने बाजी पलट दी. इसके बाद पराजय का एक अंतहीन सिलसिला शुरू हो गया.

जम्मू-कश्मीर में अलायंस जीता जरूर, लेकिन उमर अब्दुल्ला की सत्ता में हिस्सेदारी को लेकर कांग्रेस का रवैया असहज ही रहा.

महाराष्ट्र और बिहार में कांग्रेस सबसे निचले पायदान पर खिसक गई. गनीमत बस इतनी रही कि उसके मजबूत सहयोगी राजद, उद्धव शिवसेना और शरद पवार की एनसीपी भी खुद को बचा नहीं पाए.

असम में कांग्रेस की लाज सिर्फ मुस्लिम बहुल सीटों तक सिमट कर रह गई, तो बंगाल की रेस से वह पूरी तरह बाहर थी.

तमिलनाडु में जब DMK का जहाज डूबने लगा, तो चतुर कांग्रेस ने समय रहते पाला बदलकर पांच विधायकों के साथ सत्ता के नए जहाज पर छलांग लगा दी.

रही बात केरल की, तो वहां की सत्ता का मिजाज हर पांच साल में बदलने का रहा है. इस बार बारी कांग्रेस के नेतृत्व वाले UDF की थी, सो यह एक ‘तयशुदा बदलाव’ था, कोई कांग्रेस का चमत्कार नहीं.

मोदी ही हटाएंगे राहुल की राह के रोड़े!

पूरी तस्वीर का सबसे दिलचस्प और विरोधाभासी पहलू यही है कि देशभर में स्थितियां कांग्रेस के अनुकूल हो रही हैं, लेकिन इस खेल में कांग्रेस का अपना कोई पराक्रम नहीं है. मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी क्षेत्रीय दलों और वामपंथ के जिस सफाए पर संतोष जता रहे हैं, वह जमीन कांग्रेस ने नहीं, बल्कि बीजेपी ने जीती है.

लब्बोलुआब यह है कि यदि राहुल गांधी की उम्मीदें अपने संगठन की ताकत से ज्यादा बीजेपी की आक्रामक विस्तारवादी नीति पर टिकी है. राहुल गांधी की राह के कांटे खुद पीएम मोदी ही दूर कर रहे हैं. बिहार में नीतीश, बंगाल में ममता, दिल्ली में केजरीवाल और अगर स्थितियां ऐसी ही रहीं, तो 2027 में उत्तर प्रदेश में अखिलेश… बीजेपी एक-एक करके राहुल के सभी आंतरिक प्रतिद्वंदियों को रास्ते से हटा रही है.

यानी, राहुल गांधी को विपक्ष का इकलौता सुल्तान बनाने का सेहरा, अनजाने में ही सही, बीजेपी के सिर ही सजेगा.

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