है नहीं ये अच्छी, नॉर्वेजियन लड़की – Norway Helle Lyng Question PM Modi Joint Press Briefing India Press Freedom row ntc dpmx


नॉर्वे सिर्फ अपने खूबसूरत बर्फीले समुद्र तटों और मछलियों के लिए ही मशहूर नहीं है, बल्कि उसकी एक सालाना आदत भी है- पूरी दुनिया को यह बताना कि तुम सब गलत कर रहे हो! इसे ‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स’ (दुनिया में प्रेस की आजादी की रैंकिंग) कहा जाता है. इस लिस्ट में भारत का हाल बहुत बुरा है. वह इस सूची में फिलिस्तीन और वेनेजुएला के बीच कहीं है. जिनमें से एक देश गुलाम है और दूसरा आधा गुलाम. भारत के पड़ोसी पाकिस्तान और बांग्लादेश इसमें हम जैसे ही हैं. जैसे दक्षिण एशियाई सब एक जैसे दिखते हैं. इसमें तुर्की भी है, जहां के राष्ट्रपति एर्दोगन मजे-मजे में पत्रकारों को जेल भेज देते हैं. भारत इस लिस्ट में 157वें नंबर पर है और नॉर्वे हमेशा की तरह नंबर वन पर! क्योंकि नॉर्वे में बहुत आजादी है- दुनिया में सबसे ज्यादा, शायद जरूरत से ज्यादा!

वैसे आप किसी नॉर्वे वाले से भारत के लिए बहुत गर्मजोशी की उम्मीद नहीं कर सकते, क्योंकि वो देश है ही हाड़ कंपा देने वाला ठंडा. खैर, अब कहानी में एंट्री होती है बेबाक और सुनहरे बालों वाली हेली लेन की. मिस लेन एक ऐसे अखबार या वेबसाइट में लिखती हैं जिसे खुद नॉर्वे के ज्यादातर लोगों ने कभी नहीं पढ़ा. वह एक ऐसे देश के बारे में लिख रही हैं जहां नार्वे वाले कभी घूमने नहीं आएंगे. और यह सब उन्होंने एक ऐसी ज्वाइंट मीटिंग में किया जो कायदे से कोई सवाल-जवाब वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस थी ही नहीं.

यह फर्क समझना जरूरी है. दो बड़े नेताओं की ऐसी ज्वाइंट मीटिंग सिर्फ फोटो खिंचवाने (फोटोऑप) के लिए होती है. कूटनीति का थिएटर, न कि तीखी पत्रकारिता का मैदान. दुनिया का हर पत्रकार यह बात जानता है. सिवाय शायद हेली लेन के, जिन्होंने सोचा कि नरेंद्र मोदी पर प्रेस फ्रीडम को लेकर चिल्लाने का यही सबसे सही मौका है. मोदी ने कोई जवाब नहीं दिया और वह कमरे से बाहर चले गए. जब कोई आपके फोटो खिंचवाने के दौरान इस तरह चिल्लाए, तो वहां से चले जाना ही सबसे सही तरीका है.

लेकिन हेली इतने पर ही नहीं थमीं. उन्होंने लिफ्ट तक उनका पीछा किया. फिर घर जाकर इस बारे में ट्वीट कर दिया. उन्होंने लिखा, “नरेंद्र मोदी ने मेरा सवाल नहीं सुना. नॉर्वे प्रेस की आजादी में पहले नंबर पर है, जबकि भारत 157वें स्थान पर फिलिस्तीन, यूएई और क्यूबा से मुकाबला कर रहा है. हमारा काम उन ताकतों से सवाल करना है जिनके साथ कोऑपरेट कर रहे हैं.”

हेली की बातें दिलचस्प सोच की गवाही देती हैं. कि नॉर्वे का भारत के साथ हाथ मिलाना एक नैतिक भूल है और इसके लिए हेली जैसी पत्रकार का टोकना जरूरी है. जबकि सच यह है कि ठीक उसी समय नॉर्वे की सरकार भारत के साथ कई बिजनेस डील साइन कर रही थी. नॉर्वे की सरकार ने खुद पीएम मोदी को न्योता दिया था, वहां के राजा ने उनसे हाथ मिलाया था. और पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाने के बाद यह माना कि भारत बिजनेस करने के लिए एक बढ़िया देश है. लेकिन हेली के मन में सवाल थे -‘Helle Yeah’!

इसके बाद भारतीय दूतावास ने बड़े ही अति-आत्मविश्वास और भारी नासमझी में हेली को एक असली प्रेस कॉन्फ्रेंस में आने का न्योता दे दिया. उन्होंने कहा, प्रिय मिस लेन, आप खुद आइए और अपने सवाल पूछिए. उन्होंने बकायदा ट्विटर (जिसे अब एक्स कहते हैं) पर उन्हें टैग किया. यह कदम दिलदारी दिखाने के लिए तो ठीक था, लेकिन बाद में लगा कि यह समझदारी भरा नहीं था. वह आईं. उन्होंने सीधे पूछा कि “हम भारत पर भरोसा क्यों करें” और फिर बाहर चली गईं, फिर वापस आईं. इस पर भारतीय दूतावास की तरफ से विदेश मंत्रालय के सचिव सिबी जॉर्ज ने मोर्चा संभाला. उन्होंने जो भाषण दिया, उसमें सब कुछ लपेट दिया- भारत की पुरानी सभ्यता, शतरंज का खेल, योग और कुछ ऐसी बातें जिन्हें हम संस्कृत में ‘प्राचीन गौरवासन’ कह सकते हैं. उन्होंने कोरोना के समय भारत की मदद (वैक्सीन डिप्लोमेसी) का जिक्र किया, दिल्ली के 200 टीवी चैनलों की दुहाई दी और कहा कि भारत की बुराई करने वाले लोग ‘बिना सिर-पैर वाले एनजीओ’ की रिपोर्ट पढ़ते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि भारत में महिलाओं को 1947 में ही वोट देने का हक मिल गया था, उन कई देशों से बहुत पहले जिनका नाम लेना भी बेकार है.

लेकिन सिबी जॉर्ज ने जो बात नहीं कही, और उस पूरे कमरे में किसी और के दिमाग में भी नहीं आई, वह यह थी कि- भाई, तुम हमसे क्यों पूछ रही हो? अपनी खुद की सरकार से पूछो.’ नॉर्वे के विदेश मंत्रालय से पूछो कि उन्होंने मोदी को क्यों बुलाया. अपने प्रधानमंत्री से पूछो कि अगर भारत भरोसे के लायक नहीं था, तो वह उनके साथ मंच पर क्यों खड़े थे. अपने राजा से पूछो कि उन्होंने एक ऐसे नेता का स्वागत क्यों किया जिसका देश आपकी लिस्ट में 157वें नंबर पर है. अपनी संसद से पूछो कि क्या इन डील्स को पास करने से पहले उन्होंने इस पर कोई बहस की थी.

भारतीय दूतावास ने एक उतावली पत्रकार को खुद न्योता दिया और फिर तीखे सवालों के जवाब में सरस्वती नदी की सभ्यता पर एक लंबा-चौड़ा लेक्चर दे डाला. इसे कूटनीति नहीं कहते. ऐसा तब होता है जब विदेश मंत्रालय एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को प्राचीन भारत पर स्कूल का कोई प्रोजेक्ट समझने की भूल कर बैठता है.

दूसरी तरफ सोशल मीडिया (एक्स) पर, अपनी-अपनी पसंद के हिसाब से भारतीय लोग या तो हेली की तारीफ में ‘ओए हेली मेरी’ कर रहे थे, या फिर उन्हें विदेशी एजेंट और जॉर्ज सोरोस की मोहरा बता रहे थे. मोदी वाले वाकये से कुछ ही दिन पहले उनके अकाउंट को ब्लू टिक मिला था. सोमवार से पहले उनका आखिरी ट्वीट अप्रैल 2024 में नॉर्वे के युवाओं में ड्रग्स की लत को लेकर था. उससे पहले वह 2022 में एक्टिव थीं और बाकी समय बिल्कुल शांत. लोगों ने इसी चुप्पी को साजिश का सबूत मान लिया.

वह ब्लू टिक भी शक के घेरे में आ गया और ड्रग्स वाला आर्टिकल उनका बैकग्राउंड बन गया. हेली ने इस पर सफाई दी कि वह टिकटॉक और इंस्टाग्राम पर ज्यादा एक्टिव थीं. उन्होंने ब्लू टिक सिर्फ इसलिए लिया था क्योंकि उनके एक ट्वीट में स्पेलिंग की गलती हो गई थी और वह उसे सुधारना चाहती थीं, जिसके लिए उन्हें पैसे देने पड़े. सच कहें तो, ब्लू टिक पाने की इससे ज्यादा बनावटी वजह और कोई नहीं हो सकती, लेकिन इंटरनेट इस समय किसी भी बात को सीधे तरीके से समझने के मूड में नहीं था. वह कभी होता भी नहीं है. नतीजा यह हुआ कि सोमवार से पहले उनके सिर्फ 800 फॉलोअर्स थे, और अब 17,000 हैं. भारतीय इंटरनेट ने उन्हें एक्सपोज करने के चक्कर में उल्टा स्टार बना दिया.

यह एक ऐसा पुराना ढर्रा है जिससे हमने अब तक कुछ नहीं सीखा. राहुल गांधी ने भी मौका देखकर उनकी पोस्ट को शेयर कर दिया. उन्होंने पूछा, “भारत की छवि का क्या हाल होता है, जब दुनिया देखती है कि पीएम घबराकर कुछ सवालों से भाग खड़े हुए ?” उनकी इस बात में थोड़ा दम तब होता, जब विपक्ष के नेता यह बता पाते कि दुनिया के किस लोकतंत्र में प्रधानमंत्री किसी विदेशी नेता के साथ ज्वाइंट मीटिंग में इस तरह चिल्लाकर पूछे गए सवालों का जवाब देने के लिए मजबूर होता है. जवाब है- किसी में भी नहीं. यहां असली गड़बड़ यह नहीं है कि पीएम मोदी ने एक ऐसी पत्रकार को जवाब नहीं दिया जिसे उन्होंने शायद फोटो खिंचाने के शोर में सुना ही नहीं था. असली गड़बड़ तो यह है कि भारत के कूटनीतिक तंत्र ने एक मामूली सी बात पर एक कड़ा और छोटा जवाब देने के बजाय इतिहास और सभ्यता का इतना लंबा भाषण दे डाला कि वे एक ही समय में कमजोर और बड़बोले, दोनों नजर आने लगे.

हेली लेन ने लिफ्ट तक प्रधानमंत्री का पीछा किया, उन्हें 16,000 नए फॉलोअर्स मिल गए और भारत की संसद में उठने वाला मुद्दा. सिबी जॉर्ज ने शतरंज और योग के बहाने देश के सम्मान का बचाव किया. नॉर्वे प्रेस की आजादी में नंबर वन पर बना हुआ है और भारत 157वें नंबर पर. बात को यहीं खत्म करना बड़ा आसान होता, लेकिन ऐसा करना सच्चाई के साथ बेईमानी होगी. क्योंकि एक ज्वाइंट मीटिंग में सवाल का जवाब न देने वाले प्रधानमंत्री के बारे में एक सच यह भी है कि वे कहीं भी सवालों के जवाब नहीं देते. न देश में, न विदेश में. प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसलिए नहीं, क्योंकि वैसी कोई कॉन्फ्रेंस आज तक हुई ही नहीं. ब्रीफिंग में इसलिए नहीं, क्योंकि वह प्रवक्ताओं का काम है. नरेंद्र मोदी 2014 से भारत के प्रधानमंत्री हैं, वह 1.4 अरब लोगों के नेता हैं, लेकिन उन्होंने आज तक कभी किसी कमरे में मीडिया के सामने खड़े होकर यह नहीं कहा: मुझसे जो मन करे पूछो (AMA- ask me anything).

इसलिए जब सिबी जॉर्ज ने कहा कि अकेले दिल्ली में 200 टीवी चैनल हैं, तो वह गलत नहीं थे. भारत में टीवी चैनल वैसे ही भरे पड़े हैं जैसे नॉर्वे में बर्फीले तट. बस इन चैनलों के पास जो चीज नहीं है, वह है एक ऐसा प्रधानमंत्री जो किसी पत्रकार के सामने बैठकर बिना किसी स्क्रिप्ट या तैयारी के सीधे सवालों का सामना करने को तैयार हो. चैनल तो हैं, बस सवाल नहीं पूछे जाते. प्रेस की आजादी की यह एक अजीब परिभाषा है, लेकिन पिछले 11 सालों से हम इसी के साथ जी रहे हैं.

हेली ने जो 157 नंबर कहा, वह कोई मनगढ़ंत नंबर नहीं था, वह तो सिर्फ आंकड़े का हवाला दे रही थीं- भले ही वह लिस्ट खुद बड़े रहस्यमयी तरीके से तैयार होती हो. लेकिन वह नंबर सच है और उसके पीछे की चुप्पी भी सच है.

वह जहां गलत थीं, वह था उनका तरीका. ऐसी ज्वाइंट मीटिंग इसके लिए सही जगह नहीं है. किसी देश के नेता का लिफ्ट तक पीछा करना पत्रकारिता नहीं है, यह सिर्फ इंटरनेट के लिए ‘कंटेंट’ बनाना है, जिसने एक्स पर खूब व्यूज बटोरे.

और इसी बीच, दिमाग के किसी पुराने कोने में करीब तीस सालों से सोया एक गाना जाग उठा.

‘जद मैं जागिया, मैं कल्ला सी. वे चिड़ी भाग गई.’ यानी जब मैं जागा, तो मैं अकेला था. चिड़िया उड़ चुकी थी.

वह चिड़िया कोई बेजान नॉर्वेजियन ‘लकड़ी’ नहीं थी जिससे आप कम से कम फर्नीचर तो बना सकें, वह तो एक नॉर्वेजियन ‘लड़की’ थी.

‘फेर मैं अग्ग जगाई.’ यानी फिर मैंने आग जलाई.

मगर सच यह है कि किसी ने भी कोई काम की आग नहीं जलाई. दूतावास ने उन्हें बुलाकर और उल्टा काम किया. सिबी जॉर्ज ने अंतरराष्ट्रीय टीवी पर एनजीओ का नाम लेकर आग और भड़का दी. भारतीय इंटरनेट ने एक अनजान नॉर्वेजियन कॉमेंटेटर को प्रेस फ्रीडम का चेहरा बनाकर लपटें और उठा दीं. राहुल गांधी ने उस पर अपने हाथ सेक लिए. और प्रधानमंत्री, जिनकी चुप्पी से इस सब की शुरुआत हुई थी, उन्होंने कुछ नहीं कहा. जैसा कि उन्होंने हमेशा कुछ नहीं कहा है, और पूरी संभावना है कि आगे भी कुछ नहीं कहेंगे.

है नहीं ये अच्छी, नॉर्वेजियन लड़की. तो क्या यह सब अच्छा है?

No(r)way- बिल्कुल नहीं! और यह भी अच्छा नहीं था- न तो फोटो खिंचवाने के दौरान हेली का यह ड्रामा, न हमारा वह सभ्यता वाला लंबा भाषण, और न ही इंटरनेट की ट्रोलिंग. न ही वह लिफ्ट वाला वाकया, और न ही एक ऐसे लोकतंत्र में 11 सालों से बिना पूछे गए सवाल, जिसे अपने संविधान, महिलाओं के वोटिंग राइट्स और अपने उन 200 टीवी चैनलों पर बहुत गर्व है, जिन्हें प्रधानमंत्री की ‘मन की बात’ जानने के लिए भी सिर्फ सूत्रों के भरोसे रहना पड़ता है.

वह लिफ्ट, इस पूरे मामले के दौरान, कुछ भी बोलने के लिए उपलब्ध नहीं थी. और न ही प्रधानमंत्री उपलब्ध थे.

(मूल रूप से इंडिया टुडे वेबसाइट पर प्रकाशित लेख का अनुवाद)

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