दिल्ली की हवा आखिर इतनी जहरीली क्यों हो जाती है? इसका जवाब सिर्फ कारों, फैक्ट्रियों या पराली में नहीं छिपा है. एक नई रिपोर्ट ने राजधानी के प्रदूषण की ऐसी तस्वीर सामने रखी है जो चौंकाने वाली है. हर दिन करीब 17 हजार भारी ट्रक दिल्ली में दाखिल होते हैं और अकेले ये शहर के कुल ट्रांसपोर्ट पॉल्यूशन का लगभग एक-चौथाई हिस्सा पैदा कर देते हैं. हैरानी की बात यह है कि इनमें से लगभग आधे ट्रक सिर्फ चार टोल प्लाजा से होकर आते हैं. यानी अगर इन एंट्री पॉइंट्स पर सख्ती हो जाए तो दिल्ली की हवा में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है.
एयर पॉल्यूशन एक्शन ग्रुप (A-PAG), आईआईटी दिल्ली और ‘द एनर्जी एंड रिसोर्स इंस्टीट्यूट’ टेरी (TERI) ने ‘टुवार्डस क्लीनर फ्रेट इन दिल्ली’ के नाम से एक संयुक्त रिपोर्ट जारी की है. इस रिपोर्ट के मुताबिक, हर दिन करीब 16,900 भारी ट्रक दिल्ली में अलग-अलग लोकेशन से एंट्री करते हैं. ये ट्रक हर साल तकरीबन 19 टन PM2.5 और 913 टन कार्बन मोनोऑक्साइड, 1,095 टन नाइट्रोजन ऑक्साइड का उत्सर्जन करते हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, पूरे दिन के ट्रांसपोर्ट पॉल्यूशन में भारी ट्रकों की हिस्सेदारी 23 प्रतिशत है. लेकिन रात और तड़के सुबह, जब सबसे ज्यादा मालवाहक ट्रक चलते हैं, तब यही आंकड़ा बढ़कर 61 प्रतिशत तक पहुंच जाता है. यानी कम संख्या में होने के बावजूद ये ट्रक भारी मात्रा में प्रदूषण पैदा करते हैं. आमतौर पर देखा जाता है कि, रात के समय बड़े और भारी ट्रकों को शहर में एंट्री मिलती है और इनका आवागमन तेजी से होता है.
इन टोल प्लाजा पर सबसे ज्यादा ट्रक
इस स्टडी में पाया गया कि कुंडली, रजोकरी, बदरपुर और टिकरी टोल प्लाजा से दिल्ली में आने वाले ट्रकों की संख्या सबसे ज्यादा है. ये चारों टोल प्लाजा मिलकर कुल ट्रक एंट्री का आधे से ज्यादा हिस्सा संभालते हैं. वहीं, टॉप 20 टोल प्लाजा से करीब 90 प्रतिशत अंतरराज्यीय ट्रक दिल्ली में एंट्री करते हैं. एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर इन चुनिंदा एंट्री पॉइंट्स पर सख्त जांच और पॉल्यूशन कंट्रोल लागू किया जाए तो बेहतर परिणाम मिल सकते हैं. यहां तक की प्रदूषण पर भी रोकथाम की जा सकती है.
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि दिल्ली आने वाले 76 प्रतिशत ट्रक बार-बार राजधानी में एंट्री करते हैं. औसतन एक ट्रक महीने में करीब 4 बार दिल्ली आता है. इसका मतलब है कि सरकार एक तय और स्टेबल ट्रक फ्लीट को टार्गेट कर पॉल्यूशन कंट्रोल की स्ट्रेटजी बना सकती है. क्योंकि तकरीबन इन सभी ट्रकों का रूट, टाइमिंग और आने-जाने का तरीका हर बार एक जैसा ही रहता है.
कैसे हुई यह स्टडी
इसे दिल्ली में अंतरराज्यीय ट्रक ट्रैफिक पर अब तक के सबसे विस्तृत स्टडी में से एक माना जा रहा है. इसमें 121 टोल प्लाजा के RFID रिकॉर्ड, ट्रैफिक काउंट, 4,700 से ज्यादा ट्रक ड्राइवरों के सर्वे और आईआईटी दिल्ली के पोर्टेबल वर्सटाइल सोर्स सैंपलिंग सिस्टम (VS3) से रियल रोड इमिशन की जांच को शामिल किया गया है. आईआईटी दिल्ली के ट्रांसपोर्टेशन रिसर्च एंड इंजरी प्रिवेंशन (TRIP) सेंटर का कहना है कि, इस स्टडी की खास बात यह है कि इसमें टेस्टिंग लैब के आंकड़ों की बजाय सड़कों पर चल रहे ट्रकों के रियल इमिशन (उत्सर्जन) को मापा गया है. इससे प्रदूषण की सही तस्वीर सामने आती है.
रिपोर्ट में बताया गया है कि BS-VI से पहले के पुराने ट्रक सबसे ज्यादा पार्टिकुलेट मैटर प्रदूषण फैलाते हैं. यदि 2027 तक ऐसे ट्रकों के दिल्ली में एंट्री पर रोक लगा दी जाए तो इन ट्रकों से होने वाले PM2.5 उत्सर्जन में करीब 51 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है. इससे प्रदूषण के स्तर को काफी हद तक कम किया जा सकता है.
रिपोर्ट में खाली लौटने वाले ट्रकों की संख्या कम करने, शहर के बाहर फ्रेट कंसोलिडेशन सेंटर बनाने, टोल प्लाजा पर ऑटोमैटिक सर्विलांस और प्रदूषण जांच को बेहतर करने तथा धीरे-धीरे बड़े मालवाहन वाहनों को इलेक्ट्रिक तकनीक की ओर ले जाने की सिफारिश की गई है. इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि, दिल्ली आने वाले 77 प्रतिशत ट्रक NCR के पड़ोसी राज्यों से आते हैं. इसलिए एक्सपर्ट्स का मानना है कि, केवल दिल्ली में नियम सख्त करने से समस्या पूरी तरह हल नहीं होगी. इसके लिए पूरे NCR के राज्यों को मिलकर एक साझा रणनीति पर काम करना होगा.
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