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अभ‍िषेक बनर्जी खुद TMC छोड़ेंगे, या ममता न‍िकालेंगी, अब दबाव समर्थकों का है? – abhishek banerjee tmc crisis mamata pressure rebellion kalyan banerjee ntcpmr


‘ममता बनर्जी या तो अभिषेक को चुन लें या मुझे’ ये टीएमसी का कोई बागी नहीं, बल्कि कदम-कदम पर ममता के साथ खड़े कल्याण बनर्जी कह रहे थे. ममता समर्थकों में वे ही नहीं, शत्रुघ्न सिन्हा, सौगत रॉय, महुआ मोइत्रा और सागरिका घोष जैसे नेता ममता बनर्जी के प्रति तो आस्था दिखा रहे हैं, लेकिन अभिषेक बनर्जी का नाम लेने से बच रहे हैं. बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद से अभिषेक लगातार निशाने पर बने हुए हैं. पहले तो कुछ नेता परहेज भी करते थे, लेकिन अब नहीं. बागी ही नहीं, ममता समर्थकों का गुस्सा भी फूट पड़ा है. अब गेंद ममता बनर्जी के पाले में है. वे टीएमसी को टूटते देखती रहेंगी या अभिषेक बनर्जी को लेकर कोई फैसला लेंगी? वैसे फैसला अभिषेक भी ले सकते हैं. 

कल्याण बनर्जी ने तो सीधे-सीधे ममता बनर्जी को अल्टीमेटम दे दिया है. तृणमूल कांग्रेस सांसद कल्याण बनर्जी ने तो यहां तक बोल दिया है कि ममता बनर्जी को अभिषेक बनर्जी या उनमें से किसी एक को चुनना होगा. कल्याण बनर्जी ने भी अभिषेक बनर्जी के बारे में वैसी ही बातें कही हैं, जो बाकी बागी विधायक और सांसद चुनाव नतीजे आने के बाद से लगातार कहते आ रहे हैं. 

कल्याण बनर्जी से पहले टीएमसी के बागी विधायकों के नेता ऋतब्रत बनर्जी और सांसदों की नेता काकोली घोष दस्तीदार भी तृणमूल कांग्रेस की दुर्गति के लिए अभिषेक बनर्जी को जिम्मेदार ठहरा चुके हैं – कॉमन बात यह है कि विरोध के स्वर अभिषेक बनर्जी के खिलाफ निकल रहे हैं, और साइड इफेक्ट ममता बनर्जी भी झेल रही हैं. 

तृणमूल कांग्रेस में बवाल अभिषेक बनर्जी से ही शुरू हुआ है, और उनके ही इर्द-गिर्द लगातार घूम रहा है. जाहिर है, अंत भी अभिषेक बनर्जी से ही होना है – अब चाहे वो खुद फैसला लें, या फिर ममता बनर्जी की तरफ से कोई एक्शन हो.

अभिषेक बनर्जी कठघरे में क्यों

अभिषेक बनर्जी को लेकर कल्याण बनर्जी ने जो भड़ास निकाली है, वह तृणमूल कांग्रेस के ज्यादातर नेताओं के मन की बात है. ज्यादातर बागी नेता यही सोच रहे होंगे कि कल्याण बनर्जी देर से आए, लेकिन दुरुस्त आए. वैसे कुछ नेता ऐसे भी हैं जो या तो परोक्ष रूप से अभिषेक बनर्जी का बचाव कर रहे हैं, या फिर उनके बारे में बात करने से परहेज कर रहे हैं. 

पश्चिम बंगाल में टीएमसी के बागी विधायकों का नेतृत्व कर रहे ऋतब्रत बनर्जी तो अभिषेक बनर्जी को ममता बनर्जी की सबसे बड़ी कमजोरी तक बता चुके हैं. टीएमसी छोड़ने वाले नेताओं ने अभिषेक बनर्जी पर मनमानी का आरोप लगाया था, और चुनाव कैंपेन के लिए I-PAC को ठेका देने का विरोध तो हार के बाद टीएमसी की पहली मीटिंग में भी शुरू हो गया था, जिसकी लपटों में ममता बनर्जी को भी झुलसना पड़ा था. नेताओं का कहना है कि आईपैक ने पार्टी को कॉर्पोरेट संस्थान की तरह चलाने की कोशिश की. कुछ नेता तो अभिषेक बनर्जी पर तृणमूल कांग्रेस को खत्म करने जैसे गंभीर आरोप भी लगा चुके हैं. 

कल्याण बनर्जी के साथ साथ एक और सीनियर नेता सौगत रॉय ने भी अभिषेक बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस में भूमिका के खिलाफ आवाज उठाई है, लेकिन सौगत रॉय ने जोर देकर यह भी कहा है कि वो ममता बनर्जी के साथ खड़े हैं. सौगत रॉय ने भी अभिषेक बनर्जी की मनमानी की बात कही है, लेकिन खुद को अलग करते हुए. 

1. सड़क से लेकर संसद तक तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में मुखर होकर बात करने वाले कल्याण बनर्जी ने अब साफ तौर पर बोल दिया है,ममता दीदी पार्टी में अभिषेक बनर्जी को चुनेंगी तो मैं शामिल नहीं रहूंगा. कहते हैं, मैं ममता दीदी के साथ हूं, लेकिन अब दीदी को तय करना है कि क्या वो अपनी पार्टी को अभिषेक के बिना आगे नहीं ले जा सकेंगी? अगर ऐसा है तो मैं इसमें शामिल नहीं रहूंगा.

2. अभिषेक बनर्जी की मनमानी पर सवाल उठाते हुए सौगत रॉय ने ममता बनर्जी को ध्यान देने की सलाह दी है. इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में सौगत रॉय ने कहा कि बागी नेताओं की मुख्य रूप से दो शिकायतें हैं. जिनमें से एक है कि अभिषेक बनर्जी की मनमानी, और दूसरी यह कि पार्टी में उनकी शिकायतों को सुनने वाला कोई नहीं है – निश्चित तौर पर ये बड़ी चुनौतियां हैं.  

यह पूछे जाने पर कि क्या उन्होंने खुद अभिषेक बनर्जी की मनमानी को महसूस किया है, तो सौगत रॉय कहते हैं, व्यक्तिगत रूप से तो नहीं, लेकिन आम तौर पर लोगों की प्रतिक्रियाएं मैंने देखी हैं. हां, सौगत रॉय यह याद दिलाना नहीं भूलते कि वो फिलहाल ममता बनर्जी के ही साथ हैं.

3. बागी विधायकों के नेता ऋतब्रत बनर्जी ने दावा किया था कि चुनाव नतीजे आने के दो दिन बाद 6 मई को कालीघाट में हुई एक मीटिंग बुलाई गई थी, लेकिन उसमें हार की समीक्षा जैसी कोई बात नहीं हुई. ऋतब्रत बनर्जी ने आरोप लगाया कि विधायक दल के प्रदर्शन की औपचारिक समीक्षा करने के बजाय, एकमात्र प्रस्ताव जो पारित किया गया वह था, अभिषेक बनर्जी को सार्वजनिक रूप से सम्मानित करना. बोले, विधायक दल के संबंध में कोई प्रस्ताव नहीं था. केवल एक ही प्रस्ताव था. सभी को खड़े हो जाना चाहिए. अभिषेक बनर्जी के लिए खड़े होकर तालियां बजाने के लिए.

स्पीकर की तरफ से पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता पा चुके ऋतब्रत बनर्जी के मुताबिक, कई विधायक प्रस्ताव से सहमत नहीं थे. बोले, सभी झिझक रहे थे. मैं भी झिझक रहा था. लेकिन मुझमें खड़े न होने का साहस नहीं था. इसलिए मैं आधा ही खड़ा हुआ. मैं कुर्सी से पूरी तरह से नहीं उठा.

अभिषेक बनर्जी से कल्याण बनर्जी की नाराजगी पर टीएमसी सांसद शत्रुघ्न सिन्हा सवाल को टालते हुए बचकर निकलने की कोशिश करते हैं. कहते हैं, कल्याण बनर्जी बहुत बुद्धिमान और अनुभवी नेता हैं. अभिषेक बनर्जी को लेकर उनकी निजी वजहें हो सकती हैं, उन्होंने अभिषेक बनर्जी के बारे में कहा है, लेकिन वो ममता बनर्जी के साथ हैं.

कल्याण बनर्जी को देश के चुनिंदा और काबिल सांसदों में से एक बताते हुए शत्रुघ्न सिन्हा कहते हैं, उनकी नाराजगी के प्रोफेशनल कारण हो सकते हैं, हो सकता है उन्हें मान-सम्मान न मिला हो. इसलिए वो नाराज हुए हों.

शत्रुघ्न सिन्हा का कहना है, मेरी जो भी सीधी बातचीत होती थी… जो भी निर्देश-आदेश होता था वो ममता जी की तरफ से होता था. जब तक मैं पार्टी में रहूंगा, तब तक मैं ममता बनर्जी की बात सुनूंगा. मैं किसी और को नहीं जानता, और न किसी को मैं उस रूप में मानता हूं.

शुभेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री बनने में अभिषेक बनर्जी का रोल

पांच साल पहले 2021 के चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने प्रशांत किशोर को हायर किया था. सवाल तो तब भी उठे थे, लेकिन तृणमूल कांग्रेस की जीत ने विरोध की सारी आवाजें दबा दी थीं. हार के बाद वे आवाजें बेकाबू हो गई हैं, और अभिषेक बनर्जी फिर से निशाने पर आ गए हैं.

जैसे इस बार आईपैक पर सवाल उठे हैं, पिछली बार प्रशांत किशोर और उनकी टीम पर उठे थे. और, तब शुभेंदु अधिकारी (पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री) के विद्रोह के पीछे प्रशांत किशोर का चुनाव प्रबंधन बड़ी वजह बना था. आईपैक के संस्थापक प्रशांत किशोर ही हैं, लेकिन 2021 के पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद उन्होंने चुनाव कैंपेन का काम छोड़ दिया. शुभेंदु अधिकारी को समझाने के लिए पिछले चुनाव में प्रशांत किशोर उनके घर तक गए थे, लेकिन मुलाकात नहीं हो पाई थी.  

2020 की एक रैली में शुभेंदु अधिकारी ने कहा था, ‘मैं न तो पैराशूट से आया हूं और न ही लिफ्ट से ऊपर आया हूं। मैं मेहनत से ऊपर तक पहुंचा हूं.’

माना गया कि शुभेंदु अधिकारी के बयान में निशाने पर अभिषेक बनर्जी ही थे. और, अभिषेक बनर्जी के रिएक्शन से यह बात कंफर्म भी हो गई. तब अभिषेक बनर्जी ने कहा था, ‘ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस बनाई, जो ग्रासरूट पार्टी है. कोई भी पैराशूट या लिफ्ट से ऊपर नहीं आ सकता.’

तृणमूल कांग्रेस से बगावत करने वाले नेताओं और अभिषेक बनर्जी को लेकर कृष्णानगर सांसद महुआ मोइत्रा ने शुभेंदु अधिकारी की मिसाल दी है. कहा है, ‘मैं भी नकारात्मक सोच रख सकती थी. वह मुझसे काफी छोटे हैं. मैंने उन्हें राष्ट्रीय महासचिव के तौर पर स्वीकार किया है… मैं भी बागी हो सकती थी और वही कर सकती थी जो शुभेंदु अधिकारी ने किया… शुभेंदु ने कहा, मैं अगला लीडर बनना चाहता हूं. जब तक अभिषेक वहां हैं, मुझे वह जगह नहीं मिलेगी. इसलिए, मैं अलग हो जाऊंगा. मैं बीजेपी में चला जाऊंगा. ऐसा करने का एक साफ-सुथरा और पारदर्शी तरीका होता है. मैं उसका सम्मान करती हूं. मैं शुभेंदु (अधिकारी) का सम्मान करती हूं… उनके साथ मेरे बहुत अच्छे निजी संबंध रहे हैं, जो कभी खराब नहीं हुए… उनके जाने के बाद से मेरी उनसे कोई बातचीत नहीं हुई है, लेकिन उन्होंने जो कहा, उसे करके दिखाया.’ 

तृणमूल कांग्रेस जितना बड़ा विद्रोह तो नहीं, लेकिन बीएसपी में भी कुछ सीनियर नेताओं को आकाश आनंद से दिक्कत महसूस हुई थी. मायावती ने तत्काल प्रभाव से आकाश आनंद को सारे पदों से हटा दिया था. और, मायावती ने दो बार ऐसा एक्शन लिया – क्या ममता बनर्जी भी कोई सबक लेंगी या अभिषेक बनर्जी ही आकाश आनंद से कोई प्रेरणा लेंगे?

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