कल ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा है. हिंदू धर्म में ज्येष्ठ पूर्णिमा को अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी तिथि माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह दिन भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और चंद्र देव की आराधना के लिए विशेष फलदायी माना गया है. जिन लोगों की कुंडली में चंद्रमा कमजोर या पीड़ित होता है, उनके लिए भी यह समय उत्तम माना गया है. इस दिन पवित्र नदियों में आस्था की डुबकी लेने और विधिवत पूजा का भी विशेष महत्व बताया गया है. आइए जानते हैं.
क्यों खास मानी जाती है ज्येष्ठ पूर्णिमा?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ज्येष्ठ पूर्णिमा आत्मिक शुद्धि, आध्यात्मिक उन्नति और ईश्वर की उपासना का श्रेष्ठ अवसर है. इस दिन गंगा स्नान, दान-पुण्य और भगवान विष्णु-माता लक्ष्मी की पूजा करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है. कई स्थानों पर इस दिन वट सावित्री व्रत भी मनाया जाता है. मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा करने पर धन, वैभव, पारिवारिक सुख और दांपत्य जीवन में मधुरता का आशीर्वाद प्राप्त होता है.
पूजन विधि
ज्येष्ठ पूर्णिमा की सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें. इसके बाद भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के सामने दीपक जलाएं. चावल, तुलसी दल, पुष्प और घी का दीप अर्पित करें. रात्रि में चंद्रमा को दूध, जल और सफेद चंदन मिश्रित अर्घ्य दें और चंद्र मंत्र का जाप करें. पूजा के बाद जरूरतमंदों को चावल, दूध, सफेद वस्त्र और मिठाई का दान करना शुभ माना गया है.
शुभ मुहूर्त
ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04.06 बजे से 04.46 बजे तक
अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11.57 बजे से दोपहर 12.52 बजे तक
चंद्रोदय: शाम 07.16 बजे (चंद्रोदय के बाद ही चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है)
स्नान-ध्यान की विधि क्या है?
ज्येष्ठ पूर्णिमापर स्नान से पहले संकल्प लें. ईश्वर को याद करें. फिर जल को सिर माथे से लगाकर प्रणाम करें. इसके बाद स्नान करना शुरू करें. स्नान करने के बाद सूर्य को अर्घ्य दें. साफ वस्त्र या सफेद वस्त्र धारण करें. फिर “ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः” – “ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीवासुदेवाय नमः” मंत्र का जाप करें. मंत्र जाप के बाद जल और सफेद वस्तुओं का दान करें. इस दिन जल और फल ग्रहण करके उपवास रखें तो उत्तम होगा.
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