जंतर-मंतर से मिले बूस्टर को यूपी में कितना कैश करा पाएंगे चंद्रशेखर? – cjp papar leak protest up politics chandrashekhar azad political benifits up election ntcpkb


पेपर लीक के विरोध में शुरू हुआ आंदोलन अब महज भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता के सवाल तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि सियासत भी तेज हो गई है. सोशल मीडिया से शुरू हुआ आंदोलन जंतर-मंतर तक पहुंचा, अब संसद से सड़क तक गूंज रहा है. युवाओं के भीतर लगातार बढ़ते असंतोष को सपा प्रमुख अखिलेश यादव, राहुल गांधी के साथ-साथ यूपी के नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद भी भुनाने में जुटे हैं.

आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलन, संसद परिसर में रातभर के धरना प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई के खिलाफ सबसे आगे रहकर युवाओं के बीच अपनी पैठ बेहद मजबूत करते नजर आए. इतना ही नहीं इस मुद्दे को लेकर चंद्रशेखर ने 25 जुलाई को एक बड़ा कार्यक्रम करने का भी ऐलान कर दिया है. 

सड़क से लेकर संसद तक छात्रों की आवाज गूंज रही है. ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि उत्तर प्रदेश की भावी राजनीति में चंद्रशेखर के लिए छात्र आंदोलन क्या ‘बूस्टर डोज’ साबित होगा? 

चंद्रशेखर आजाद 25 जुलाई को करेंगे आंदोलन
चंद्रशेखर आजाद 20 जुलाई की रात 11 बजे से संसद भवन परिसर में डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा के नीचे धरने पर बैठे हैं. बारिश, धूप और खराब मौसम के बावजूद उनका धरना जारी है. अब उन्होंने 25 जुलाई 2026 को बड़ा कार्यक्रम करने की घोषणा की है. भीम आर्मी और आजाद समाज पार्टी के कार्यकर्ता सभी जिला मुख्यालयों पर धरना प्रदर्शन कर ज्ञापन सौंपेग.

पेपर लीक और शिक्षा में धांधली के मुद्दे के साथ-साथ चंद्रशेखर ने अब रामपुर में आजम खान की मौलाना मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी पर प्रस्तवित बुलडोजर एक्शन के खिलाफ प्रदर्शन करने का ऐलान किया है. उन्होंने कहा कि यह मामला भी शिक्षा से जुड़ा हुआ है और इसे ज्ञापन में शामिल किया जाएगा. उन्होंने आरोप लगाया कि शिक्षा से जुड़े संस्थानों को निशाना बनाया जा रहा है और सरकार छात्रों के मुद्दों पर बातचीत नहीं कर रही है. 

चंद्रशेखर आजाद ने संसद परिसर में दिया धरना
जंतर मंतर पर सोमवार को युवाओं पर हुए लाठीचार्ज, आंसू गैस के गोले और बर्बरता से पिटाई के खिलाफ आजाद समाज पार्टी के सांसद और भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद उसी रात संसद परिसर में धरने पर बैठ गए हैं. चंद्रशेखर ने पुलिस कार्रवाई की तुलना जलियांवाला बाग कांड से कर दी. कहा कि उस कांड को तो हम लोगों ने नहीं देखा लेकिन जंतर मंतर पर जो कुछ देखा है, उसने जलियांवाला बाग की याद जरूर ताजा कर दी है.

भारी बारिश के बीच चंद्रशेखर आजाद अकेले ही धरना देते रहे. नीट परीक्षा में धांधली का आरोप लगाते हुए कैबिनेट मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांग किया. उन्होंने अपने समर्थकों से 20 जुलाई को जंतर-मंतर पहुंचने का ऐलान किया था, जिसके बाद उनकी पार्टी के नेता और कार्यकर्ता बड़ी संख्या में शामिल हुए थे. सीजेपी के जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलन में भी चंद्रशेखर सोमवार को शामिल हुए थे. 

चंद्रशेखर के लिए क्या सियासी बूस्टर साबित होगा
जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र आंदोलन का सियासी असर उत्तर प्रदेश की राजनीति पर भी पड़ सकता है. इसी वजह यह है कि इस आंदोलन के बाद सबसे पहले यूपी में चुनाव होने हैं. यूपी के लोग बड़ी संख्या में छात्र दिल्ली के जंतर-मंतर पर आंदोलन कर रहे हैं. ऐसे में चंद्रशेखर आजाद ने फ्रंटफुट में उतरकर अपनी राजनीति के एक नई पहचान देने की कवायद की है. 

चंद्रशेखर आजाद की राजनीति आंदोलन से शुरू हुई है और उन्होंने धरना प्रदर्शन व जमीन पर उतरकर संघर्ष ही अपनी छवि बनाई है. चंद्रशेखर की पहचान अब तक केवल दलित या मुस्लिम राजनीति तक सीमित मानी जाती थी. लेकिन पेपर लीक और छात्र आंदोलन के मंच पर आकर उन्होंने ओबीसी, सामान्य और निम्न-मध्यम वर्ग के युवाओं को सीधा जोड़ा है. 

कांग्रेस या सपा जैसे बड़े विपक्षी दल जंतर-मंतर के मंच पर सीधे उतरने से झिझक रहे थे, तब चंद्रशेखर खुद रातभर जंतर-मंतर पर डटे रहे और बारिश में संसद परिसर में धरना दिया. इससे युवाओं में संदेश गया कि वे असली ‘जमीनी नेता’ हैं. नगीना लोकसभा सीट जीतने के बाद अब राज्यव्यापी छात्र-आक्रोश को नेतृत्व देकर उन्होंने खुद को केवल पश्चिमी यूपी तक सीमित न रखकर पूरे प्रदेश में प्रोजेक्ट किया है. 

दलित समाज के बीच चंद्रशेखर बना पाएंगे पैठ
आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के प्रमुख और नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद का ग्राफ विशेष रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश और जाटव-दलित युवाओं के बीच तेजी से बढ़ा है. 2024 के लोकसभा चुनाव में चंद्रशेखर आजाद ने बिना किसी बड़े गठबंधन के नगीना सीट से 1.5 लाख से अधिक वोटों के भारी अंतर से जीत दर्ज की. उन्होंने बीजेपी और सपा दोनों के उम्मीदवारों को पछाड़कर यह साबित किया कि दलित युवा अब एक आक्रामक और जमीनी नेता की तलाश में है, जो सड़कों पर उनके साथ खड़ा हो सके.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीएसपी का वजूद पूरी तरह से खत्म कहना शायद अभी जल्दबाजी होगी, लेकिन 2027 का चुनाव मायावती के लिए करो या मरो की लड़ाई है. अगर मायावती ने कैडर को बुस्टअप नहीं किया तो, 2022 और 2024 से भी ज्यादा खराब स्थिति हो सकती है. चंद्रशेखर आजाद लगातार संसद में आवाज बुलंद कर रहे हैं. दिल्ली में छात्रों के लाठीचार्ज के विरोध में संसद भवन में धरने पर बैठककर युवाओं में एक खास मैसेज जा रहा है.

यूपी चुनाव में दो ध्रवीय राजनीति का पेच फंसेगा
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में अब द्विध्रुवीय राजनीति हावी हो रही है. एक तरफ बीजेपी का एनडीए गठबंधन और दूसरी तरफ सपा-कांग्रेस का इंडिया ब्लॉक. जब बीएसपी अकेले मैदान में उतरती है, तो मतदाता उसे रेस से बाहर मानकर अपना वोट बीजेपी या सपा-कांग्रेस को ट्रांसफर कर देते हैं. अगर मायावती ने 2027 से पहले अपने पारंपरिक कैडर को एकजुट करने के लिए जमीनी रणनीति नहीं बदली, तो जाटव वोट बैंक का बड़ा हिस्सा चंद्रशेखर आजाद और सपा-कांग्रेस गठबंधन के बीच बंट सकता है.

यूपी नगीना सीट से सांसद चंद्रशेखर आजाद ने जिस तरह से जंतर-मंतर पर संघर्ष करते नजर आए हैं, उसे लेकर भी सियासी चर्चा तेज है. मुद्दा उठाना और भीड़ जुटाना एक बात है, लेकिन उसे बूथ स्तर पर वोटों में तब्दील करना दूसरी बात. यूपी में आजाद समाज पार्टी का संगठनात्मक ढांचा अभी भी बसपा या सपा के मुकाबले कमजोर है. सपा और कांग्रेस भी पेपर लीक के मुद्दे को भुनाने में पीछे नहीं हैं. राहुल गांधी और अखिलेश यादव लगातार सरकार पर हमलावर हैं, जिससे वोटों का बंटवारा हो सकता है.

2027 के विधानसभा चुनाव आने तक क्या युवाओं का यह आक्रोश और चंद्रशेखर का यह ‘ऑरा’ बना रहेगा, या सरकार की नई नीतियों/कानूनों के बाद यह मुद्दा शांत पड़ जाएगा. जंतर-मंतर के छात्र आंदोलन ने चंद्रशेखर आजाद को उत्तर प्रदेश का सबसे मुखर ‘यूथ आइकॉन’ बनने का सुनहरा मौका दे दिया है. वे इस जनाक्रोश को यूपी के जिलों और तहसीलों तक सांगठनिक रूप से ले जाने में सफल रहे, तो वे 2027 में अहम रोल अदा कर सकते हैं?
 

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