‘डॉक्टर भी यही लिखेंगे…’, भारतीय घरों में हो रही इस गलती से कई गुना बढ़ रहा अस्पताल का खर्च, मामूली इंफेक्शन ले रहा जान – Indian Antibiotic resistance increases treatment cost 3 Times fatal death risk infections Tvisa


बुखार, जुकाम, सिरदर्द या पेट की समस्याओं में लोग मेडिकल स्टोर से जाकर दवाएं ले आते हैं. खुद से दवा लेने की ये आदत अधिकतर भारतीय घरों में है, लेकिन ये गलती सेहत और जेब दोनों पर भारी पड़ रही है. जिसका इलाज 20 रुपये में मिलने वाली दवा से हो जाता, अब उसी इलाज के लिए हॉस्पिटलाइज तक होना पड़ रहा है और तिगुनी से ज्यादा कीमत चुकानी पड़ती है. कुछ मामलों में तो एक छोटी सी लापरवाही की वजह से मौत तक हो रही है. आप आप सोचेंगे कि ऐसा क्यों हो रहा है? डॉक्टरों का कहना है कि इसका कारण बिना वजह एंटीबायोटिक लेना है. 

हाल ही में इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) की नई स्टडी आई है, जो बताती है कि देश में एंटीबायोटिक रेजिस्टेंट बैक्टीरियल इंफेक्शन की वजह से मौत का खतरा बढ़ रहा है और इलाज भी महंगा हो रहा है. ये रिसर्च द लेंसेट रीजनल हेल्थ-साउथेस्ट एशिया में पब्लिश हुई है. इसके आंकड़े 2022 से 2025 के बीच के हैं जिसमें करीब 1.6 लाख मरीजों पर रिसर्च की गई है. 

एंटीबायोटिक रजिस्टेंस क्या होता है

जब एंटीबायोटिक दवाओं का शरीर पर असर नहीं होता है तो इसको एंटीबायोटिक रजिस्टेंस कहते हैं. ऐसा तब होता है जब कोई व्यक्ति  हल्के से इंफेक्शन में ही खुद से एंटीबायोटिक खाना शुरू कर देता है और लंबे समय तक इनको खाता है. ज्यादा मात्रा में इनको खाने से शरीर पर इनका असर होना कम या बंद हो जाता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि दवाओं को ज्यादा खाने से बैक्टीरिया इनको पहचान लेते हैं. वह खुद को इन दवाओं के खिलाफ ताकतवर बना लेते हैं. ऐसे में बैक्टीरिया पर कोई असर नहीं होता है और इससे इलाज मुश्किल और महंगा हो जाता है. 

20 रुपये की दवा 70 की कैसे पड़ रही? 

गाजियाबाद के मैक्स हॉस्पिटल में इंटरनल मेडिसिन विभाग में एसोसिएट डायरेक्टर डॉ. पंकजनंद चौधरी ने इस बारे में बताया है. वह कहते हैं कि अब कई मरीजों में सामान्य एंटीबायोटिक दवाएं असर नहीं कर रही है. इस वजह से मरीजों को एक जनरेशन आगे की एंटीबायोटिक दी जा रही हैं. जनरेशन जितनी बढ़ेगी कीमत भी उतनी ही ज्यादा होगी. जैसे अगर किसी मरीज पर 20 रुपये की कोई एंटीबायोटिक असर नहीं कर रही है तो फिर उसको दूसरी एंटीबायोटिक दी जाती हैं. जिनकी कीमत 3 गुना तक अधिक हो सकती है. इस वजह से 20 रुपये की दवा करीब 60 से 70 रुपये की पड़ती है. इसका खर्च मरीज को ही देना पड़ता है. 

डॉ. चौधरी बताते हैं कि एंटीबायोटिक को उनकी प्रभावशीलता और बैक्टीरिया के खिलाफ काम करने के दायरे के आधार पर 5 जनरेशन (पीढ़ी) में बांटा गया है. इनमें सेफालेक्सीन पहली जनरेशन की एंटीबायोटिक है. जिसका यूज स्किन, यूरिन जैसे बैक्टीरियल इंफेक्शन में किया जाता है. वहीं, सेफ्टारोलिन पांचवी जनरेशन की एंटीबायोटिक है इसका यूज निमोनिया जैसे इंफेक्शन के लिए किया जाता है. चिंता की बात यह है कि कुछ मामलों में पांचवीं जनरेशन की एंटीबायोटिक भी काम नहीं कर रही हैं.  

एंटीबायोटिक दवाएं

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मौत का भी बन रहा कारण

डॉ चौधरी कहते हैं कि उनके पास ऐसे कई मरीज आते हैं जिनमें सामान्य एंटीबायोटिक दवाओं ने असर करना बंद कर दिया है. मरीज से उसकी हिस्ट्री पूछते हैं तो पता चलता है कि किसी को सालों से जुकाम की समस्या है तो वह एंटीबायोटिक खा रहा है तो कोई यूरिन इंफेक्शन होने पर हर हफ्ते ये कुछ महीनों में इनको खाता रहता है. बिना वजह इनको खाना, जरूरत से ज्यादा डोज लेना ही इनके शरीर पर इनके असर न होने का कारण बन रहा है. असर न होने से दवाएं बदलनी पड़ रही हैं. कुछ मामलों में दवाएं असर ही नहीं कर रही है, ज मौत का कारण बन रहा है.  

एंटीबायोटिक दवाएं

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अब लोगों को क्या करना चाहिए

इस बारे में दिल्ली के आरएमएल हॉस्पिटल में मेडिसिन विभाग में डायरेक्टर प्रोफेसर डॉ. सुभाष गिरि ने बताया है. वह कहते हैं कि एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस एक बड़ी समस्या बन चुका है. इससे बचाव बहुत जरूरी है, नहीं तो आने वाले समय में इसका काबू करना मुश्किल हो सकता है. इससे बचाव के लिए जरूरी है कि हमेशा डॉक्टर की सलाह से ही एंटीबायोटिक लें. बीच में तबीयत ठीक महसूस होने पर भी एंटीबायोटिक दवाएं लेना बंद न करें और डॉक्टर द्वारा तय किया गया कोर्स पूरा करें. पुरानी या बची हुई एंटीबायोटिक दवाओं का दोबारा इस्तेमाल न करें और न ही इन्हें किसी अन्य व्यक्ति के साथ शेयर करें. 

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