सुबह का वक्त है. संगम के किनारे हल्की-हल्की चहल-पहल शुरू हो चुकी है. कोई गंगा-यमुना के पानी में डुबकी लगा रहा है. कोई घाट पर बैठा है. किसी के सामने पूजा की थाली सजी है. कहीं मंत्र पढ़े जा रहे हैं और कहीं पिंड तैयार किए जा रहे हैं. और इन सबके बीच एक चीज लगातार हो रही है. लोग अपने उन लोगों को याद कर रहे हैं, जो अब उनके बीच नहीं हैं.
पितृ चल रहा है. प्रयागराज में देश-दुनिया से लोग पहुंच रहे हैं. किसी को अपने पिता के लिए पिंडदान करना है, किसी को मां के लिए तर्पण करना है और कोई अपने परिवार के पुरखों को याद करने संगम पहुंचा है. आंध्र प्रदेश से आए जयचंद्र प्रसाद भी इसी सिलसिले में प्रयागराज पहुंचे हैं. उनके हाथ में पूजा की सामग्री है और मन में अपने पिता की याद. वह पिता के लिए पिंडदान करने आए हैं. उम्मीद यही है कि पिता को शांति मिले और परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहे.
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एक बेटा हजारों किलोमीटर का सफर तय करके अपने पिता के लिए संगम पहुंचा है. वहीं, बहुत से लोग ऐसे हैं, जो दूर हैं और किन्हीं वजहों से प्रयागराज नहीं आ सकते, उनके लिए भी यहां ऑनलाइन सुविधा है. पितृ पक्ष में अपने पुरखों के लिए पिंडदान कर सकते हैं. इस सदियों पुरानी परंपरा में एक नया रास्ता दिखाई देता है… ऑनलाइन पिंडदान और तर्पण.
प्रयागराज के तीर्थ पुरोहित बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों से ऐसे श्रद्धालुओं के लिए ऑनलाइन माध्यम से पिंडदान की व्यवस्था की जा रही है, जो किसी वजह से यहां नहीं पहुंच पाते. यानी एक तरफ संगम के घाट पर बैठे लोग मंत्र सुन रहे हैं. दूसरी तरफ कोई स्क्रीन के जरिए इस कर्मकांड से जुड़ रहा है.

और ये सिर्फ देश में बैठे लोगों तक सीमित नहीं है. तीर्थ पुरोहितों के मुताबिक, विदेश में रहने वाले लोग भी इस तरह की व्यवस्था के जरिए जुड़ रहे हैं. एक अमेरिकी यात्री के ऑनलाइन पिंडदान कराने की बात भी सामने आई है.
एक तरफ संगम. दूसरी तरफ अमेरिका. बीच में हजारों किलोमीटर की दूरी. लेकिन मकसद एक – अपने पुरखों को याद करना. अब परंपरा निभाने का तरीका बदल रहा है.
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प्रयागराज क्यों पहुंचते हैं लोग? इस सवाल का जवाब प्रयागराज के घाटों पर बैठे तीर्थ पुरोहितों के पास है. तीर्थ पुरोहित प्रदीप पांडे बताते हैं कि सनातन परंपरा में प्रयागराज, काशी और गया का अलग धार्मिक महत्व माना जाता है. इसे एक मान्यता के जरिए समझाया जाता है – विष्णु मुख प्रयाग, विष्णु नाभि काशी और विष्णु चरण गया.
तीर्थ पुरोहितों के मुताबिक, इसी वजह से कई श्रद्धालु पितरों के लिए किए जाने वाले कर्मकांड में प्रयागराज, काशी और गया की यात्रा को महत्वपूर्ण मानते हैं. यानी कहानी सिर्फ एक घाट की नहीं है. इसके पीछे एक पूरी धार्मिक यात्रा की मान्यता जुड़ी है. और इसी मान्यता के चलते पितृ पक्ष आते ही संगम पर श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ने लगती है.

घाट पर बैठे लोगों को देखिए तो लगेगा कि सब एक जैसा कर्मकांड कर रहे हैं. लेकिन थोड़ा करीब जाइए तो पता चलता है कि हर किसी के पीछे एक अलग कहानी है. किसी की आंखों के सामने पिता की तस्वीर है. किसी को मां की याद आ रही है. किसी ने अपने दादा के बारे में घर में सुनी कहानियों को ही उनकी पहचान के तौर पर संभाल रखा है. और कोई पहली बार अपने परिवार की इस परंपरा को आगे बढ़ाने आया है. ये उन रिश्तों को याद करने का मौका भी है, जो वक्त के साथ आंखों से दूर हो गए.
और अब इसमें मोबाइल भी आ गया है
अगर कुछ साल पहले तक किसी को बताया जाता कि एक दिन लोग हजारों किलोमीटर दूर बैठकर अपने पुरखों के लिए ऑनलाइन पिंडदान कराएंगे. शायद सुनने में अजीब लगता. लेकिन आज ऐसा हो रहा है. हालांकि ऑनलाइन पिंडदान को लेकर धार्मिक दृष्टि से अलग-अलग लोगों की अपनी मान्यताएं और समझ हो सकती हैं.
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प्रयागराज में तीर्थ पुरोहित इसे उन लोगों तक कर्मकांड पहुंचाने के एक माध्यम के तौर पर बता रहे हैं, जो खुद यहां नहीं आ सकते. इस कहानी में परंपरा नहीं बदली, पहुंचने का रास्ता बदल गया. मंत्र आज भी वही हैं. तर्पण आज भी होता है. पिंड आज भी बनाया जाता है. संगम आज भी वही है. बस अब उस परंपरा से जुड़ने के लिए हर किसी को संगम तक पहुंचना जरूरी नहीं रह गया है.
पीले कपड़ों से लेकर नई पीढ़ी तक
पितृ पक्ष के दौरान घाटों पर कई श्रद्धालु पीले कपड़ों में भी नजर आते हैं. तीर्थ पुरोहितों के मुताबिक, कुछ लोग इस दौरान पारंपरिक वेशभूषा और निर्धारित तरीके का पालन करते हैं. अब यहां युवा भी पहुंच रहे हैं. तीर्थ पुरोहितों का कहना है कि नई पीढ़ी भी पितरों के लिए किए जाने वाले कर्मकांड में शामिल हो रही है.

एक बार फिर संगम के घाट को देखिये… जयचंद्र प्रसाद जैसे श्रद्धालु यहां मौजूद हैं. किसी ने लंबा सफर तय किया है. कोई अपने पिता के लिए आया है. कोई अपने परिवार के पुरखों के लिए. कहीं मंत्र गूंज रहे हैं. कहीं जल अर्पित हो रहा है. कहीं पिंड रखा है. और इसी कहानी के दूसरे छोर पर कोई ऐसा व्यक्ति भी है, जो शायद प्रयागराज से हजारों किलोमीटर दूर बैठा है, लेकिन अपने पुरखों को याद करने के लिए ऑनलाइन माध्यम से जुड़ा है.
दोनों की दूरी अलग है. तरीका अलग है. लेकिन भावना एक है. पुरखों को याद करना. शायद यही वजह है कि पितृ पक्ष की इस कहानी में सबसे बड़ा बदलाव तकनीक का नहीं, बल्कि तकनीक के साथ परंपरा के चलने का है. सदियों पुरानी परंपरा ने मोबाइल को अपने बीच जगह दे दी है. अब संगम के घाट पर मंत्र भी हैं, हाथ में पिंड भी है… और कहीं दूर किसी स्क्रीन पर ऑनलाइन तर्पण भी. परंपरा वही है. बस रास्ता नया है.
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