भारत में अपना घर होना सफलता और सुरक्षा का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता रहा है. हालांकि, हाल ही में चार्टर्ड अकाउंटेंट नितिन कौशिक के एक सोशल मीडिया थ्रेड ने इस धारणा को चुनौती देते हुए एक नई बहस छेड़ दी है. उन्होंने डेटा के साथ यह समझाने की कोशिश की है कि भारत में आवासीय संपत्ति खरीदना वास्तव में धन पैदा करने वाला निवेश है या महज एक भावनात्मक फैसला, जिसे हम अनजाने में निवेश मान बैठते हैं.
नितिन कौशिक ने X पर एक विस्तृत पोस्ट साझा करते हुए तर्क दिया कि अधिकांश घर मालिक अपने अपार्टमेंट से मिलने वाले रिटर्न का आकलन करते समय भारी गलती करते हैं. उन्होंने बताया कि लोग अक्सर संपत्ति के बढ़े हुए दामों को तो देखते हैं, लेकिन उन छिपे हुए खर्चों को भूल जाते हैं जो मुनाफे को भीतर ही भीतर खोखला कर देते हैं.
कौशिक ने स्पष्ट शब्दों में लिखा, “आपका घर संपत्ति के वेश में एक ‘लिक्विडिटी ट्रैप’ है.” उन्होंने आगे कहा कि बहुत से लोग नाममात्र की कीमत में वृद्धि को ही वास्तविक संपत्ति निर्माण समझने की गलती कर बैठते हैं. उनके अनुसार, कागज पर बढ़ी हुई कीमत और हाथ में आने वाले वास्तविक मुनाफे के बीच एक बड़ा अंतर होता है.
रिटर्न की गणना को समझाने के लिए कौशिक ने एक काल्पनिक उदाहरण साझा किया. मान लीजिए, साल 2015 में एक फ्लैट 80 लाख रुपये में खरीदा गया था, जिसकी वर्तमान कीमत अब लगभग 1.2 करोड़ रुपये है. पहली नजर में यह 40 लाख रुपये का मुनाफा दिखता है, लेकिन कौशिक ने इसकी गहरी परतें खोली हैं.
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उनके अनुसार, यदि आप 6% स्टाम्प ड्यूटी, हर महीने का सोसाइटी मेंटेनेंस और सालाना प्रॉपर्टी टैक्स जैसे अतिरिक्त खर्चों को जोड़ दें, तो उस घर की प्रभावी खरीद और रख-रखाव की लागत बढ़कर 95 लाख रुपये के करीब पहुंच जाती है.
सालाना रिटर्न की हकीकत: उन्होंने तर्क दिया कि एक दशक में निवेश का 95 लाख रुपये से बढ़कर 1.2 करोड़ रुपये होना, सालाना केवल 2.3% का रिटर्न (CAGR) दर्शाता है.
महंगाई की मार और क्रय शक्ति
कौशिक ने ध्यान दिलाया कि यह 2.3% का रिटर्न भारत की दीर्घकालिक महंगाई दर से भी काफी कम है. उन्होंने टिप्पणी की, “वास्तविक रूप में, आपकी क्रय शक्ति असल में घट गई है.” उनका कहना है कि घर के मालिक कागज पर तो खुद को अमीर महसूस कर सकते हैं, लेकिन वे ऐसा रिटर्न जेनरेट करने में विफल रहते हैं जो महंगाई को मात दे सके और वास्तव में उनकी संपत्ति में वृद्धि कर सके.
इस थ्रेड में आवासीय संपत्ति के रिटर्न की तुलना उसी अवधि के दौरान इक्विटी मार्केट (शेयर बाजार) के प्रदर्शन से भी की गई है. कौशिक का दावा है कि यदि वही 80 लाख रुपये साल 2015 में निफ्टी 50 इंडेक्स फंड में निवेश किए गए होते, तो 2026 तक वह निवेश बढ़कर 2.2 करोड़ रुपये से अधिक हो गया होता. यह अपार्टमेंट से मिलने वाले रिटर्न की तुलना में कहीं अधिक है.
उन्होंने इस अंतर को ‘अपॉर्चुनिटी कॉस्ट’ बताया, यानी वह कीमत जो आपने अपनी पूंजी को कम लिक्विडिटी और बार-बार होने वाले खर्चों वाली रियल एस्टेट संपत्ति में फंसाकर चुकाई है. उनकी इस बात ने ऑनलाइन दुनिया में, विशेषकर युवा निवेशकों के बीच काफी चर्चा बटोरी है, जो अब पारंपरिक प्रॉपर्टी के बजाय म्यूचुअल फंड और इंडेक्स निवेश जैसे वित्तीय एसेट्स को अधिक पसंद कर रहे हैं.
अपार्टमेंट बनाम जमीन क्या है बेहतर?
कौशिक ने आगे तर्क दिया कि अपार्टमेंट एक घटती हुई संपत्ति की तरह व्यवहार करते हैं क्योंकि समय के साथ इमारत पुरानी होती जाती है और उसकी मरम्मत, रखरखाव व अपग्रेड पर लगातार पैसा खर्च करना पड़ता है. उन्होंने तंज कसते हुए लिखा, “जिस दिन आप घर में रहने जाते हैं, इमारत तभी से गलनी शुरू हो जाती है.” उनका दावा है कि निवेशक वास्तव में “डेड स्क्वायर फुटेज” के लिए भुगतान कर रहे होते हैं, जिसका मूल्य धीरे-धीरे कम होता जाता है.
इसके बजाय, उन्होंने उभरते हुए विकास क्षेत्रों में जमीन खरीदने की वकालत की, उनके अनुसार जमीन के लाभ जमीन के रखरखाव का खर्च अपार्टमेंट की तुलना में बहुत कम होता है. उन्होंने उदाहरण दिया कि यदि 80 लाख रुपये का प्लॉट बढ़कर 3.5 करोड़ रुपये का हो जाता है, तो यह लगभग 15.8% की सालाना चक्रवृद्धि दर से रिटर्न देता है.
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