महाराष्ट्र विधानसभा ने एक ऐसा फैसला किया है जो पूरे देश में पहली बार हुआ है. राज्य में महिला किसान सशक्तिकरण बिल को सर्वसम्मति से मंजूरी दे दी गई है. इस फैसले के बाद खेती या उससे जुड़े काम करने वाली महिलाओं को आधिकारिक तौर पर किसान का दर्जा मिलेगा. अब वे सरकारी योजनाओं का सीधा फायदा ले सकेंगी. इस ऐतिहासिक बदलाव से लाखों महिलाओं को समाज में सम्मान मिलने के साथ-साथ आगे बढ़ने का रास्ता भी साफ हो गया है.
गांवों में महिलाएं बुआई से लेकर कटाई तक पुरुषों के बराबर मेहनत करती हैं. इसके बावजूद जमीन पुरुषों के नाम होने के कारण महिलाओं को कभी सरकारी रिकॉर्ड में किसान नहीं माना जाता था. इसी वजह से वे बैंक लोन या सरकारी मदद से बाहर रह जाती थीं. यह नया कानून इसी बड़े अंतर को खत्म करने के लिए लाया गया है, ताकि मेहनत करने वाली महिलाओं को उनकी असली पहचान मिल सके.
सिर्फ खेती नहीं, हर काम को मिलेगी मान्यता
इस नए कानून में महिला किसान की परिभाषा को काफी बड़ा रखा गया है. अब सिर्फ फसल उगाने वाली ही नहीं, बल्कि पशुपालन, डेयरी, मुर्गी पालन, मछली पालन या मधुमक्खी पालन से जुड़ी महिलाओं को भी किसान माना जाएगा. सरकार इन सभी महिलाओं को ‘महिला किसान पहचान पत्र’ देगी. इस एक कार्ड की मदद से उन्हें बैंक से कर्ज, फसल बीमा, सरकारी सब्सिडी, बीज, खाद और सीधे मंडियों में अपनी उपज बेचने की सुविधा आसानी से मिलने लगेगी.
पूरी व्यवस्था को ठीक से चलाने के लिए सरकार एक खास ढांचा तैयार कर रही है. इसके लिए एक राज्य स्तरीय समिति बनेगी जो पूरे काम की निगरानी रखेगी. सदन में चर्चा के दौरान यह बात भी सामने आई कि सिर्फ पहचान देना ही काफी नहीं होगा. ग्रामीण इलाकों में महिलाओं की सेहत, उनके पोषण और आर्थिक मजबूती पर भी काम करना जरूरी है. कुछ सुझाव यह भी आए कि महिलाओं को परिवार की खेती वाली जमीन में सह-मालिक बनाया जाना चाहिए.
यह कानून लागू होने के बाद महिलाएं खेतों में सिर्फ मजदूरी करने वाली श्रमिक नहीं कहलाएंगी. उन्हें बकायदा एक स्वतंत्र किसान का दर्जा मिलेगा. सरकार का मानना है कि इस कदम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी बहुत मजबूत होगी. वे अपने पैरों पर खड़ी हो सकेंगी और बिना किसी पर निर्भर रहे, खुद फैसले ले पाएंगी.
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