‘मुस्लिम जाति नहीं, एक धर्म है’, कोर्ट ने दिया छात्र को लोहार सर्टिफिकेट देने का आदेश – Muslim is religion not caste Court orders issuance of lohar certificate ntc acwi


बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने 17 वर्षीय छात्र के जाति प्रमाण पत्र से जुड़े मामले में एक बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. कोर्ट ने मुंबई की यवतमाल जिला जाति छानबीन समिति के उस आदेश को रद्द किया है जिसमें एक 17 वर्षीय छात्र के जाति दावे के खारिज कर दिया गया था. 

कोर्ट ने समिति को आदेश दिया है कि वह दो हफ्तों में छात्र को ‘लोहार’ खानाबदोश जनजाति-B (Nomadic Tribe-B) का समुदाय का सदस्य बताते हुए जाति वैधता प्रमाण पत्र जारी करे. 

जस्टिस उर्मिला जोशी फाल्के और जस्टिस राज डी. वाकोडे की बेंच ने 28 अगस्त को यह आदेश दिया था. छात्र हसनैन रियाजुद्दीन चौहान ने हाई कोर्ट में एक याचिका दाखिल की थी. दरअसल, छात्र 12वीं के बाद यवतमाल के जवाहरलाल डार्डा इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी में कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था. कॉलेज में एडमिशन के समय उससे जाति वैधता प्रमाण पत्र मांगा गया. खास बात ये थी कि छानबीन समिति ने छात्र के पिता और सगी बहन को लोहार जाति का वैधता प्रमाण पत्र मिल जाने के बावजूद भी उसके दावे को अमान्य कर दिया. 

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छात्र ने अपनी जाति के दावे की पुष्टि करने के लिए आजादी से पहले के ऐसे रिकॉर्ड भी पेश किए जिनमें उसके पूर्वजों को लोहार बताया गया था. लेकिन समिति ने रिकॉर्ड में मुस्लिम शब्द का उल्लेख होने के आधार पर छात्र के दावे को खारिज कर दिया. हाई कोर्ट ने पाया कि संविधान लागू होने से पहले के तीन रिकॉर्ड में छात्र के पूर्वजों को लगातार मुसलमान लोहर या लोहार मुसलमान बताया गया था. इसमें उसके दादा, चचेरे दादा और परदादा से जुड़े रिकॉर्ड भी शामिल थे. 

कोर्ट ने इस मामले में उल्लेख किया कि मुसलमान जाति नहीं धर्म है. इसलिए सिर्फ इसलिए कि जाति के नाम के आगे या पीछे मुसलमान शब्द जुड़ा है इसलिए दस्तावेजों को खारिज नहीं किया जा सकता. 

कोर्ट ने इस बात को भी स्पष्ट किया है कि समिति याचिकाकर्ता के पिता और बहन को जारी वैधता प्रमाण पत्रों को नजरअंदाज करने का भी कोई कारण नहीं बता पाई. कोर्ट ने एक पुराने फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि खून के रिश्तेदार को दिए गए जाति वैधता प्रमाण पत्र को आम तौर पर माना जाना चाहिए. कोर्ट ने पिछले आदेश को रद्द करते हुए याचिकाकर्ता को लोहार समुदाय का सदस्य घोषित किया. 

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