सिंधु पर फैसला देने वाले हेग कोर्ट को भारत ने क्यों और किस आधार पर हड़का दिया? – Permanent Court Arbitration Hague indus water treaty india Pakistan ntcppl


अंतरराष्ट्रीय अदालतों के फैसलों को लेकर दुनिया में दोहरी नीति लंबे समय से चली आ रही है. हाल ही में हेग स्थित परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने सिंधु जल संधि को लेकर भारत के खिलाफ फैसला सुनाया. कोर्ट ने कहा कि संधि अभी भी पूरी तरह प्रभावी है और भारत को इसका पालन करना चाहिए.

भारत ने तुरंत इस फैसले को खारिज कर दिया. भारत के विदेश मंत्रालय ने सबसे पहले इस अदालत की संवैधानिकता पर सवाल खड़े किए. भारत ने दो टूक कहा कि इस तथाकथित अदालत को भारत के संप्रभु फैसलों पर कोई अधिकार नहीं है.

 यह रुख अचानक नहीं आया है. भारत से पहले चीन ने हेग कोर्ट को उसकी औकात दिखा दी थी. 

चीन भी इस कोर्ट के फैसले को मानने से इनकार कर चुका है

साल 2016 में फिलीपींस ने दक्षिण चीन सागर विवाद को लेकर हेग ट्रिब्यूनल में याचिका दायर की थी. इसी कोर्ट ने चीन के नाइन-डैश लाइन दावे को खारिज करते हुए फैसला सुनाया कि चीन का ऐतिहासिक अधिकार अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार मान्य नहीं है. चीन ने उसी दिन तत्काल फैसले को अवैध, शून्य और बाध्यकारी नहीं बताते हुए पूरी तरह खारिज कर दिया.

बीजिंग का रुख साफ था यह फैसला हमारी संप्रभुता पर कोई असर नहीं डाल सकता. आज दस साल बाद भी चीन उसी फैसले को बेकार कागज बताता है और अपने दावों पर अड़ा हुआ है. 

चीन के विदेश मंत्रालय का एक बहुत ही सख्त बयान जारी किया और कहा कि यह फैसला “बेअसर और अमान्य है और इसे मानने की कोई बाध्यता नहीं है.

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चीन ने अपने बयान से इस कोर्ट की हैसियत साफ कर दी. 

दरअसल परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (PCA) नीदरलैंड्स के हेग में स्थित एक अंतर-सरकारी संगठन है. यानी की कई देशों का संगठन है. यह 1899 और 1907 के हेग कन्वेंशन फॉर द पैसिफिक सेटलमेंट ऑफ इंटरनेशनल डिस्प्यूट्स के तहत स्थापित हुआ. यह स्थायी अदालत नहीं है, बल्कि मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) के लिए प्रशासनिक सहायता प्रदान करता है. 

कैसे काम करता है

पक्षकार अपनी सहमति से विवाद PCA के समक्ष लाते हैं. हर मामले के लिए एक अस्थायी ट्रिब्यूनल गठित होता है. PCA का इंटरनेशनल ब्यूरो रजिस्ट्री और लॉजिस्टिक सपोर्ट देता है. 

नाम में ‘Court’ होने के बावजूद PCA में ICJ जैसी स्थायी बेंच नहीं होती. विवाद आने पर संबंधित पक्ष पंचों का एक ट्रिब्यूनल बनाते हैं. PCA की स्थायी इकाई उसका इंटरनेशनल ब्यूरो  है, जो कानूनी, प्रशासनिक और रजिस्ट्री सहायता देता है

जजों/आर्बिट्रेटर्स की नियुक्ति

दुनिया में इस संगठन के 120 से ज्यादा सदस्य हैं. प्रत्येक देश को अधिकतम चार योग्य व्यक्तियों को जज या पंच के रूप में सूचीबद्ध करने का अधिकार है. इनका कार्यकाल 6 वर्ष होता है और इसे रिन्यू किया जा सकता है.

पक्षकार इन्हीं लोगों में से या बाहर से आर्बिट्रेटर्स चुनते हैं. आवश्यकता पड़ने पर PCA के सेक्रेटरी-जनरल नियुक्ति प्राधिकारी के रूप में काम करते हैं. 

द हेग कोर्ट का फैसला बाध्यकारी नहीं

PCA के फैसलों की बाध्यता पक्षकारों की सहमति पर निर्भर करती है. इसके पास स्वयं कोई बाध्यकारी प्रवर्तन शक्ति नहीं है. यह अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय जैसी स्थायी अदालत नहीं, बल्कि सुविधा देनी वाली संस्था है. 

PCA हेग कन्वेंशन के तहत स्थापित एक मध्यस्थता संस्था है, न कि पारंपरिक अदालत. यह केवल प्रशासनिक सहायता, रजिस्ट्री और ट्रिब्यूनल गठन की सुविधा देता है. इसके फैसलों की बाध्यता पक्षकारों की आपसी सहमति पर आधारित होती है. 

PCA के पास कोई प्रवर्तन तंत्र या पुलिस/सैन्य शक्ति नहीं है. यह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसी किसी संस्था से सीधे जुड़ा नहीं है, जो जबरदस्ती लागू कर सके. अंतरराष्ट्रीय कानून में आर्बिट्रेशन पुरस्कारों का पालन ‘सद्भावना’ यानी ‘गुड फेथ’ पर निर्भर करता है. यदि कोई पक्ष फैसला नहीं मानता, तो दूसरा पक्ष अपने देश की अदालतों या द्विपक्षीय समझौतों के जरिए प्रवर्तन की कोशिश कर सकता है, लेकिन PCA खुद कुछ नहीं कर सकता. 

सिंधु जल समझौते में भारत के लिए राष्ट्रहित सर्वोपरि

अब इस अदालत ने सिंधु जल संधि में एकतरफा फैसला दिया है. 1960 की इस संधि को भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद स्थगित कर दिया था. बिलबलाए पाकिस्तान ने हेग कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. कोर्ट ने भारत के खिलाफ फैसला सुनाया, लेकिन नई दिल्ली ने चीन जैसा ही रुख अपनाया. भारत का कहना है कि कोर्ट का गठन ही संधि की शर्तों के उल्लंघन में हुआ है, इसलिए उसके फैसले का कोई महत्व नहीं. 

अंतर्राष्ट्रीय अदालतें अक्सर शक्तिशाली देशों के खिलाफ फैसलों को लागू नहीं करा पातीं. चीन ने दक्षिण चीन सागर में अपनी सैन्य और आर्थिक ताकत के बल पर फैसले को नजरअंदाज किया. भारत भी सिंधु के पानी पर अपना राष्ट्रीय हित सर्वोपरि मान रहा है और पाकिस्तान को साफ संदेश दिया है पानी और खून साथ-साथ नहीं बह सकते हैं.

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