‘आपको डॉक्टर लिखने का हक नहीं’, मासूम रेप पीड़िता की मौत पर सुप्रीम कोर्ट की फटकार – supreme court slams doctor over 4 year old rape victim death ghaziabad ntc rlch


सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद में चार साल की मासूम बच्ची के साथ हुए दुष्कर्म और इलाज न मिलने के कारण उसकी मौत के मामले में शुक्रवार को दो प्राइवेट अस्पतालों को कड़ी फटकार लगाई. कोर्ट ने अस्पतालों के इस रवैये को निर्दयी और क्रूर बताते हुए पीड़ित परिवार को मुआवजा देने का निर्देश दिया है.

शीर्ष अदालत का सबसे ज्यादा गुस्सा उस आयुर्वेदिक डॉक्टर पर फूटा जिसने बच्ची को फर्स्ट एड देने से इनकार कर दिया था. CJI सूर्यकांत की अगुवाई वाली तीन जजों की पीठ ने सख्त लहजे में कहा, ‘अगर आप अपना कर्तव्य नहीं निभा सकते, तो आपको अपने नाम के आगे डॉक्टर लिखने का कोई अधिकार नहीं है.’

अदालत ने कहा कि यदि अस्पताल में इलाज की सुविधा नहीं थी, तब भी डॉक्टर को बच्ची को दूसरे अस्पताल तक पहुंचाने में मदद करनी चाहिए थी. कोर्ट ने सवाल किया, ‘क्या आपने बच्ची की अनदेखी इसलिए की क्योंकि वह गरीब परिवार से थी?’

क्या है पूरा मामला?

यह मामला इसी साल मार्च का है. बच्ची के परिवार का आरोप है कि पड़ोस में रहने वाला एक व्यक्ति उसे चॉकलेट दिलाने के बहाने अपने साथ ले गया था. काफी देर तक वापस नहीं लौटने पर परिवार ने उसकी तलाश शुरू की. बाद में बच्ची खून से लथपथ और बेहोशी की हालत में मिली.

परिजनों का आरोप है कि बच्ची को पहले दो प्राइवेट अस्पतालों में ले जाया गया, लेकिन दोनों ने भर्ती करने से इनकार कर दिया. इसके बाद उसे गाजियाबाद जिला अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

SIT जांच में क्या सामने आया?

परिवार ने मामले में जांच और इलाज में गंभीर लापरवाही का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट ने विशेष जांच दल (SIT) से जांच कराने का आदेश दिया था. SIT की प्रारंभिक जांच में सामने आया कि प्राइवेट अस्पतालों ने बच्ची को समय पर जरूरी चिकित्सा सहायता उपलब्ध नहीं कराई.

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘इतने जघन्य अपराध की शिकार बच्ची आपके पास लाई गई और आपने उसे प्राथमिक चिकित्सा तक नहीं दी.’ अदालत ने यह भी कहा कि अस्पतालों पर दंड लगाने के साथ-साथ पीड़ित परिवार को उचित मुआवजा भी दिया जाना चाहिए.

पुलिस जांच पर भी उठाए सवाल

इससे पहले की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद पुलिस की जांच को भी संवेदनहीन बताते हुए फटकार लगाई थी. अदालत ने कहा कि घटना के एक दिन बाद एफआईआर दर्ज की गई और शुरुआत में उसमें POCSO कानून की धाराएं भी नहीं जोड़ी गईं. पोस्टमार्टम में बच्ची के निजी अंगों पर चोट के निशान मिलने के बावजूद शुरुआती एफआईआर में दुष्कर्म की धाराएं भी शामिल नहीं की गईं.

सुप्रीम कोर्ट ने मामले में दबाने की कोशिश (हश-हश अप्रोच) का भी जिक्र किया और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए एसआईटी जांच के आदेश दिए थे.

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