सऊदी अरब और यमन के हूती लड़ाकों के बीच जंग रोज जोर पकड़ती जा रही है. ईरान वॉर के बैकग्राउंड में हूतियों का रेड सी यानी लाल सागर पर बढ़ता दबदबा ग्लोबल ऑयल सप्लाय पर नया संकट बनकर उभर रहा है. लाल सागर और गल्फ ऑफ ओमान से जोड़ने वाले बाब अल मंदब स्ट्रेट से गुजर रहे सऊदी टैंकरों पर हूती लड़ाके हमले कर रहे हैं. वे सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट ऑयल पाइपलाइन पर कामयाबी से हमला कर चुके हैं, और अब इससे भी ऑयल सप्लाय बंद है. हूतियों का बढ़ता दबदबा सऊदी अरब और मक्का डिफेंस पैक्ट में उसके सहयोगी पाकिस्तान और तुर्की के लिए गले की हड्डी बन गया है.
सऊदी और हूती संघर्ष इस बात की मिसाल है कि मिडिल ईस्ट की जिओ-पॉलिटिक्स हमेशा से बेहद उलझी और दिलचस्प रही है. आज जब सऊदी अरब और हूती विद्रोहियों के बीच भीषण जंग और बमबारी की खबरें सुर्खियां बनती हैं, तो लगता है कि ये दोनों पक्ष हमेशा से एक-दूसरे के खून के प्यासे रहे होंगे. लेकिन दोनों का इतिहास हैरान कर देने वाला है. यमन के इसी इलाके में एक समय ऐसा भी था, जब सऊदी अरब और हूती (यानी जैदी समुदाय के लोग) दुश्मन नहीं, बल्कि कंधे से कंधा मिलाकर एक ही जंग लड़ रहे थे.
यमन के भूगोल और वहां के कबीलाई, रीजनल व जातीय गठबंधनों का ताना-बाना कुछ ऐसा है कि यहां किसी भी बाहरी हमलावर के लिए टिक पाना हमेशा से नामुमकिन और भारी नुकसानदेह रहा है. सऊदी अरब और मिस्र दोनों ही अतीत में यमन की जमीन पर अपने हाथ जला चुके हैं. आइए समझते हैं यमन, हूती आंदोलन, जैदी समुदाय और सऊदी अरब के इस बेहद दिलचस्प और गहरे राजनीतिक व युद्ध इतिहास को.
यमन में जैदी समुदाय सदियों से एक प्रमुख ताकत रहा है, हालांकि वे यमन की कुल आबादी में हमेशा से अल्पसंख्यक रहे हैं. आज यमन की करीब 2 करोड़ 40 लाख की आबादी में जैदी समुदाय लगभग एक-तिहाई हिस्सा है.
इस्लाम के शिया संप्रदाय में जैदियों को सबसे अलग और उदार माना जाता है. जहां ईरान और इराक में बहुसंख्यक ‘इश्मा अशरी’ (12 इमामों को मानने वाले) शिया हैं, वहीं जैदी समुदाय शियाओं की एक अलग शाखा है जो पांचवें इमाम, इमाम जैद इब्न अली के अनुयायी हैं. धार्मिक मान्यताओं और तौर-तरीकों में जैदी शिया, सुन्नी इस्लाम के ‘हनफी’ और ‘शाफई’ विचारों के काफी करीब माने जाते हैं. इनमें ईरान के शियाओं की तरह कई परंपराएं या कट्टरता नहीं होतीं.
इतिहास बताता है कि यमन पर सदियों तक जैदी इमामों का शासन रहा है. पहले यह इलाका ऑटोमन साम्राज्य का हिस्सा था, लेकिन प्रथम विश्व युद्ध के बाद 1918 में यमन स्वतंत्र हुआ और इसके पहले शासक जैदी समुदाय के प्रमुख इमाम याह्या बने.
1934 की जंग: जब सऊदी ने छीने यमन के इलाके
इमाम याह्या ने 1920 और 1930 के दशकों में उत्तरी यमन के कबीलाई इलाकों पर अपना शासन फैलाया, जहां मुख्य रूप से सुन्नी आबादी रहती थी. लेकिन याह्या ने यमन को दुनिया से अलग-थलग रखा और उनके पास कोई बाहरी सहयोगी नहीं था.
दूसरी तरफ, सऊदी अरब के संस्थापक इब्न सऊदी अपनी ताकत बढ़ा रहे थे. 1932 में आधुनिक सऊदी अरब की स्थापना के ठीक दो साल बाद, 1934 में सऊदी अरब और यमन (इमाम याह्या) के बीच एक छोटी सी जंग हुई. इस जंग में सऊदी अरब ने ‘असीर’ और ‘नजरान’ नाम के दो बड़े इलाकों पर कब्जा कर लिया. जैदी और इमाम याह्या इन इलाकों को ‘ऐतिहासिक यमन’ का हिस्सा मानते थे. यही से लाल सागर के किनारे पर कब्जे के विवाद की ऐसी नींव पड़ी, जो अब तक अनसुलझी है.
इमाम याह्या की 1948 में मौत के बाद उनके बेटे इमाम अहमद ने यमन का अलगाव खत्म किया. उन्होंने अपनी सेना को अपग्रेड करने और बाकी डेवलपमेंट की खातिर सोवियत संघ और चीन के साथ राजनयिक संबंध बनाए. इससे सऊदी राजघराने में नई बेचैनी पैदा हो गई, क्योंकि वे अपनी दक्षिणी सीमा पर कम्युनिस्ट प्रभाव से डरते थे.
जब सऊदी अरब और जैदी इमाम बने जिगरी दोस्त!
1950 और 1960 के दशक में अरब दुनिया में राजशाही को उखाड़ फेंकने और क्रांति की लहर चल रही थी. मिस्र के सैनिक तानाशाह गमाल अब्दुल नासिर इस क्रांति के सबसे बड़े चेहरे थे. नासिर ने ‘रेडियो वॉयस ऑफ द अरब’ के जरिए यमन समेत पूरे अरब में राजशाहियों के खिलाफ अलख जगाई.
सितंबर 1962 में यमन के इमाम अहमद की मौत हो गई और उनके बेटे इमाम बदर गद्दी पर बैठे. लेकिन महज एक हफ्ते के भीतर मिस्र के नासिर से प्रभावित यमनी सेना के अफसरों ने तख्तापलट कर दिया और यमन को ‘गणराज्य’ (रिपब्लिक) घोषित कर दिया.
तख्तापलट के बाद यमन में शह और मात का खेल शुरू हो गया. जैदी इमाम और उनके शाही समर्थक अपनी सत्ता बचाने के लिए भागे. अब सवाल यह था कि इन जैदी शिया इमामों की मदद किसने की?
हैरानी की बात यह है कि सऊदी अरब का सुन्नी राजघराना, जो खुद को वहाबी इस्लाम का गढ़ मानता था, उसने जैदी इमामों को बचाने के लिए खजाना खोल दिया. सऊदी अरब नहीं चाहता था कि उसकी बगल में मिस्र के समर्थन वाली कोई सैन्य या रिपब्लिकन सरकार बने.
इसके बाद यमन गृहयुद्ध के मैदान में बदल गया. यह जंग एक तरफ ‘प्रगतिशील’ रिपब्लिकन (जिन्हें मिस्र का समर्थन था) और दूसरी तरफ ‘रूढ़िवादी’ राजशाही समर्थक जैदी (जिन्हें सऊदी अरब का समर्थन था) के बीच लड़ी गई.
मिस्र के नासिर ने यमन में अपनी सेना झोंक दी. 1963 में 30 हजार और 1965 तक 70 हजार मिस्री सैनिक यमन में लड़ रहे थे, जो मिस्र की कुल सेना का लगभग आधा हिस्सा था. यमन के कबीलाई लड़ाकों ने अपने दुर्गम पहाड़ों में मिस्र की सेना को ऐसा उलझाया कि 10 हजार से ज्यादा मिस्र के सैनिक मारे गए. यह जंग नासिर के लिए ‘मिस्र का वियतनाम’ साबित हुई.
दूसरी तरफ सऊदी अरब ने अपनी सेना भेजने के बजाय जैदी लड़ाकों को भारी फंडिंग की, हथियार दिए और भाड़े के विदेशी सैनिकों को काम पर लगाया. 1967 में इजरायल के हाथों अरब देशों की हार के बाद मिस्र को आखिरकार यमन से अपनी सेना वापस बुलानी पड़ी.
यह इतिहास का वह दौर था, जब आज के हूतियों के पूर्वज (जैदी शाही समर्थक) और सऊदी अरब एक ही झंडे के नीचे मिस्र की सेना के खिलाफ लड़ रहे थे.
सोवियत संघ से करीबी के चलते हूतियों की फिर सऊदी से ठनी
गृहयुद्ध खत्म होने के बाद उत्तरी यमन रिपब्लिक ही रहा. उधर दक्षिणी यमन में, जहां अंग्रेजों का कब्जा था, 1967 में एक कम्युनिस्ट सरकार बन गई, जिसे तत्कालीन सोवियत संघ का समर्थन प्राप्त था.
मई 1990 में सोवियत संघ के कमजोर पड़ने के बाद, उत्तरी यमन और दक्षिणी यमन का विलय हो गया और ‘रिपब्लिक ऑफ यमन’ बना. उत्तरी यमन के राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह इस यूनिफाइड यमन के राष्ट्रपति बने. जिनका सद्दाम हुसैन वाले इराक से भी काफी दोस्ताना था.
जिससे जल्द ही सऊदी और यमन के रिश्ते फिर बिगड़ गए. अगस्त 1990 में जब इराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन ने कुवैत पर हमला किया, तो सऊदी अरब और अमेरिका ने सद्दाम के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. लेकिन यमन के राष्ट्रपति सालेह ने सद्दाम हुसैन का समर्थन किया. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में यमन ने अमेरिका और सऊदी अरब के प्रस्ताव के खिलाफ वोट दिया.
यमन के इस कदम से गुस्साए सऊदी अरब ने अपने देश में काम कर रहे करीब 7.50 लाख यमनी मजदूरों और उनके परिवारों को रातों-रात बाहर निकाल दिया. सऊदी का सोचना था कि इस इकोनॉमिक प्रेशर से परेशान होकर यमन की जनता राष्ट्रपति सालेह के खिलाफ बगावत कर देगी. लेकिन हुआ उल्टा, यमन की जनता सालेह के साथ खड़ी हो गई.
इसके बाद जब 1994 में दक्षिणी यमन ने अलग होने की कोशिश की, तो सऊदी अरब ने दक्षिणी विद्रोहियों को पैसा और हथियार दिए. लेकिन राष्ट्रपति सालेह ने इस बगावत को कुचल दिया और सऊदी का दांव एक बार फिर उल्टा पड़ गया.
हूती आंदोलन का जन्म और सऊदी के साथ नई दुश्मनी का आगाज
अमेरिका पर हुए 9/11 हमलों के बाद राष्ट्रपति सालेह ने समझदारी दिखाई और अल-कायदा के खिलाफ लड़ाई में अमेरिका और सऊदी अरब के सहयोगी बन गए.इसी दौरान, उत्तरी यमन के सादा इलाके में जैदी समुदाय के भीतर एक नया धार्मिक और राजनीतिक आंदोलन आकार ले रहा था, जिसका नेतृत्व हुसैन बदरुद्दीन अल-हूती कर रहे थे. इसी वजह से इस समूह को ‘हूती’ कहा गया.हूतियों का आरोप था कि यमन सरकार जैदी समुदाय की अनदेखी कर रही है और सऊदी अरब की मदद से यमन में कट्टरपंथी वहाबी और सलाफी विचारधारा को बढ़ावा दे रही है, जिससे जैदी पहचान खतरे में है.
2004 से 2009 के बीच राष्ट्रपति सालेह की सरकार और उत्तरी सीमा पर स्थित हूती विद्रोहियों के बीच 6 बार भीषण युद्ध हुए. इन सभी युद्धों में सऊदी अरब ने सालेह सरकार का पूरा समर्थन किया.2009 के छठे युद्ध में तो सऊदी अरब की सेना सीधे तौर पर जंग में कूद पड़ी. सऊदी सेना ने हूतियों के ठिकानों पर हमले किए, लेकिन यमन के पथरीले पहाड़ों में हूतियों के गुरिल्ला वॉर के सामने सऊदी सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा और उसके करीब 200 सैनिक मारे गए.
सऊदी-हूती संघर्ष से इतिहास के सबक
1960 के दशक में मिस्र की बर्बादी और 2009 में खुद का नुकसान देखते हुए सऊदी अरब यमन की जमीन पर अपनी सेना भेजने से बचता रहा है और ज्यादातर हवाई हमलों पर निर्भर रहता है.लेकिन इराक, सीरिया, लिबिया और हाल के ईरान युद्ध ने यह साबित किया है कि सिर्फ हवाई हमलों से कभी भी निर्णायक जीत हासिल नहीं की जा सकती.यमन का इतिहास गवाह है कि जब भी किसी बाहरी देश ने यमन पर दबाव बनाने या हमला करने की कोशिश की है, तो वहां के लोग अपने आपसी मतभेद भूलकर बाहरी दुश्मन के खिलाफ एकजुट हो गए हैं.
सऊदी अरब और हूतियों की यह कहानी जिओ-पॉलिटिक्स का एक ऐसा सबक है जो बताता है कि राजनीति में न तो कोई स्थायी दोस्त होता है और न ही कोई स्थायी दुश्मन. जो जैदी कभी सऊदी के पैसों पर अपनी सत्ता बचा रहे थे, आज वही हूती बनकर सऊदी अरब के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बने हुए हैं.
—- समाप्त —-
