USA: फ्लोरिडा में आग से झुलसे तेलंगाना के भारत चंदर की मौत, 15 दिन तक लड़ी जिंदगी की जंग – florida fire case telangana man died in fire accident america bharat chander pvzs


अमेरिका के फ्लोरिडा में आग की चपेट में आकर गंभीर रूप से झुलसे भारत चंदर रेड्डी ने करीब 15 दिनों तक जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ी. तमाम कोशिशों के बावजूद बुधवार, 12 अगस्त को इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई. भारत हसनपर्थी के गुंटरपल्ली गांव के रहने वाले थे और पढ़ाई के लिए अमेरिका में रह रहे थे. 25 जुलाई को फ्लोरिडा के टाम्पा में हुए हादसे में उनका शरीर करीब 75 फीसदी तक झुलस गया था, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था.

हादसे के बाद डॉक्टर लगातार भारत का इलाज कर रहे थे. परिवार को उम्मीद थी कि इलाज के बाद उनका बेटा ठीक होकर घर लौट आएगा, लेकिन करीब दो हफ्ते तक जिंदगी के लिए संघर्ष करने के बाद भारत ने दम तोड़ दिया. उनकी मौत की खबर जैसे ही परिवार तक पहुंची, घर में मातम छा गया. जिस मां-बाप को बेटे के वापस लौटने का इंतजार था, उनके लिए यह खबर किसी सदमे से कम नहीं थी. भारत की मौत से उनके पैतृक गांव गुंटरपल्ली में भी शोक की लहर दौड़ गई.

भारत चंदर रेड्डी साल 2023 में बेहतर भविष्य और अपनी पढ़ाई पूरी करने का सपना लेकर अमेरिका गए थे. वह पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने गांव लौटना चाहते थे और परिवार के साथ जिंदगी बसाने की योजना बना रहे थे. बताया जा रहा है कि भारत ने घर लौटकर शादी करने और अपने परिवार के साथ रहने के सपने भी देखे थे. लेकिन फ्लोरिडा में हुए आग हादसे ने उनके और उनके परिवार के सारे सपनों को एक झटके में चकनाचूर कर दिया. अब परिवार अपने बेटे के वापस लौटने का इंतजार कर रहा है, लेकिन इस बार भारत जीवित नहीं बल्कि पार्थिव शरीर के रूप में घर आएंगे.

भारत की मौत की खबर के बाद उनके पैतृक गांव में गम का माहौल है. रिश्तेदार और गांव के लोग परिवार को ढांढस बंधाने के लिए उनके घर पहुंच रहे हैं. करीबियों के लिए यह यकीन करना भी मुश्किल हो रहा है कि जिस युवक के जल्द घर लौटने की उम्मीद थी, अब उसका पार्थिव शरीर अमेरिका से भारत लाने की तैयारी करनी पड़ रही है. परिवार के सामने इस वक्त सबसे बड़ी चुनौती बेटे के शव को जल्द से जल्द भारत लाने की है. परिजनों ने सरकार से मदद की गुहार लगाई है और मांग की है कि भारत का पार्थिव शरीर अमेरिका से भारत लाने की व्यवस्था जल्द की जाए, ताकि अंतिम संस्कार उसके पैतृक गांव की मिट्टी में हो सके.
 

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