पेपर लीक की समस्या केवल परीक्षा व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि रोजगार और शिक्षा के असंतुलन का नतीजा है. निर्भया कांड की तरह, सिर्फ सख्त कानून और फास्ट-ट्रैक कोर्ट इसका स्थायी समाधान नहीं हैं. असली हल ब्लॉकचेन और AI जैसी नई तकनीक, स्किल-बेस्ड भर्ती, प्राइवेट सेक्टर के विस्तार और नए करियर विकल्पों से ही संभव है.
निर्भया कांड के बाद देश ने उम्मीद की थी कि कड़े कानून महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर निर्णायक अंकुश लगाएंगे. कानून बने, सजा बढ़ी, फास्ट ट्रैक कोर्ट बने, लेकिन अपराध कम होने के बजाए और बढ़ गए. कानून के कड़े होने के चलते कई मामलों में अपराधियों ने सबूत मिटाने के लिए पीड़िताओं की हत्या तक कर दी. इससे एक बात स्पष्ट होती है कि सिर्फ सजा बढ़ा देने से किसी सामाजिक समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलता.
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अपराध की जड़ पर चोट किए बिना कानून सीमित असर ही दिखाते हैं. पेपर लीक का संकट भी कुछ ऐसा ही है. देशभर में प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाओं ने करोड़ों युवाओं का भरोसा हिला दिया है. विपक्ष शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग कर रहा है. सरकार फास्ट ट्रैक कोर्ट, और सख्त कानून तथा कड़ी सजा का भरोसा दे रही है. लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल दंडात्मक उपाय इस समस्या का समाधान कर सकते हैं? अनुभव कहता है कि शायद नहीं.
उत्तराखंड ,उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों ने बार-बार पेपर लीक को रोकने के लिए पहले के मुकाबले बेहद कठोर कानून अभी हाल ही में बनाएं हैं. केंद्र ने भी 2024 में सार्वजनिक परीक्षा कानून बनाकर तीन से दस साल तक की सजा और भारी जुर्माने का प्रावधान किया. इसके बावजूद पेपर लीक की घटनाएं खत्म नहीं हुईं. कारण स्पष्ट है कि समस्या कानून की कमजोरी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की है, जिसने एक परीक्षा को लाखों युवाओं के जीवन-मरण का प्रश्न बना दिया है.
आर्थिक उदारीकरण के बाद निजी क्षेत्र ने युवाओं के लिए नए सपने पैदा किए थे. आईटी, सॉफ्टवेयर और कॉरपोरेट सेक्टर में लाखों नौकरियां सामने आीं. सरकारी नौकरी ही सफलता का एकमात्र रास्ता नहीं रह गई थी. योग्यता और मेहनत के दम पर निजी क्षेत्र में भी शानदार करियर बन सकता था, लेकिन कोविड महामारी के बाद परिस्थितियां तेजी से बदलीं. छंटनी, भर्ती में कमी, वेतन वृद्धि पर रोक और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता ने निजी क्षेत्र का आकर्षण कमजोर कर दिया.
नतीजा यह हुआ कि बड़ी संख्या में युवा फिर सरकारी नौकरियों की इच्छा रखने लगे. निजी क्षेत्र नौकरियों से लोगों का मोह भंग होने लगा. यहीं से पेपर लीक जैसी समस्या और गंभीर हो गई. जब लाखों उम्मीदवार कुछ हजार सीटों के लिए प्रतिस्पर्धा करेंगे, तब परीक्षा का महत्व असामान्य रूप से बढ़ जाएगा. जहां दांव पूरी जिंदगी का हो, वहां अवैध बाजार भी खड़ा हो जाता है. पेपर लीक का कारोबार इसी असंतुलन की उपज है.
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देश में सबसे अधिक प्रतिस्पर्धा मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं में है. इसकी वजह केवल सीटों की कमी नहीं, बल्कि यह धारणा भी है कि सम्मान, स्थिर आय और सुरक्षित भविष्य का रास्ता मुख्यतः इन्हीं पेशों से होकर जाता है. जब तक युवाओं के सामने आकर्षक वैकल्पिक करियर नहीं होंगे, तब तक यह दबाव कम नहीं होगा. डेटा साइंस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बायोटेक्नोलॉजी, ग्रीन एनर्जी, साइबर सिक्योरिटी, डिजिटल मार्केटिंग, गेम डेवलपमेंट, कंटेंट इकोनॉमी, एग्री-टेक, हेल्थ-टेक, स्किल-बेस्ड प्रोफेशन और स्टार्टअप इकोसिस्टम जैसे क्षेत्रों को उसी स्तर का सामाजिक और आर्थिक महत्व देना होगा, जैसा आज डॉक्टर और इंजीनियर बनने को मिलता है. इसलिए जितना प्राइवेट सेक्टर का विकास होगा, उतना ही इन नौकरियों का आकर्षण बढ़ेगा. इसके साथ ही करियर जितने विविध होंगे, किसी एक परीक्षा पर दबाव उतना ही कम होगा.
भारत में कई बड़ी समस्याओं का समाधान पुरानी व्यवस्था को सुधारकर नहीं, बल्कि उसका विकल्प तैयार करके निकला है. भारतीय ट्रेनों की भीड़ उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों के लिए बहुत बड़ी समस्या होती थी. लंबी दूरी की यात्रा में हाइवे और एयरपोर्ट के विस्तार ने रेलवे पर दबाव कम किया. दिल्ली-एनसीआर में अगर रेलवे से एक साफ सुथरी इंटरसिटी ट्रेन चलाने की जिम्मेदारी दी जाती तो वह कभी भी मेट्रो नेटवर्क की तरह सेवा नहीं दे पाती. ऑटो चालकों की मनमानी को नियंत्रित करने के लिए वर्षों तक तरह-तरह के नियम बनाए गए, लेकिन वास्तविक बदलाव तब आया जब ऐप आधारित टैक्सी सेवाओं ने पूरी व्यवस्था ही बदल दी.पेपर लीक के मामले में भी यही सोच अपनानी होगी.नई तकनीक और इनोवेशन पर जोर देना होगा.
सरकार और विपक्ष केवल सुरक्षा बढ़ाने पर जोर दे रहा है. लेकिन परीक्षा प्रणाली को नई तकनीक पर आधारित बनाने के बिना काम नहीं बनने वाला है. ब्लॉकचेन आधारित एन्क्रिप्शन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से रियल-टाइम मॉनिटरिंग, मल्टीपल रैंडम प्रश्नपत्र, डिजिटल प्रश्न डिस्ट्रिब्यूशन और चरणबद्ध ऑनलाइन परीक्षाएं लीक की संभावना को काफी हद तक समाप्त कर सकती हैं. जब प्रश्नपत्र छपेंगे ही नहीं और उनका भौतिक परिवहन नहीं होगा, तब लीक की गुंजाइश भी बहुत सीमित रह जाएगी.
समस्या का दूसरा बड़ा कारण डिग्री-केंद्रित रोजगार व्यवस्था है. आज भी अधिकांश नौकरियों में डिग्री पहली शर्त है, जबकि वास्तविक कार्यक्षमता अक्सर अलग होती है. यदि भर्ती प्रक्रिया में स्किल टेस्ट, प्रोजेक्ट, पोर्टफोलियो और व्यावहारिक योग्यता को प्राथमिकता मिले, तो डिग्री हासिल करने की होड़ अपने आप कम होगी. शिक्षा व्यवस्था को भी उद्योग से जोड़ना होगा. छोटे अवधि के प्रमाणपत्र, अप्रेंटिसशिप, ऑनलाइन स्किल प्रोग्राम और उद्योग आधारित प्रशिक्षण को मुख्यधारा में लाना होगा. जब रोजगार का आधार डिग्री नहीं बल्कि क्षमता होगी, तब एक परीक्षा का महत्व भी कम होगा.
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पेपर लीक का स्थायी समाधान केवल परीक्षा व्यवस्था के भीतर नहीं मिलेगा.जब तक निजी क्षेत्र पर्याप्त और सम्मानजनक रोजगार नहीं देगा, तब तक सरकारी नौकरियों की दीवानगी बनी रहेगी. इसलिए उद्योगों को प्रोत्साहन, स्टार्टअप्स को समर्थन, निवेश बढ़ाने वाली नीतियां और रोजगार सृजन को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना होगा.साथ ही सरकार को नियमित, समयबद्ध और पारदर्शी भर्तियां भी सुनिश्चित करनी होंगी, ताकि वर्षों तक भर्ती प्रक्रियाएं लटकी न रहें.
दुर्भाग्य यह है कि इस पूरे मुद्दे पर लगभग सभी राजनीतिक दल समस्या के समाधान से अधिक राजनीतिक लाभ में रुचि लेते दिखाई देते हैं. विपक्ष इस्तीफे की मांग और आंदोलनों के जरिए युवाओं का समर्थन जुटाना चाहता है. सत्ता पक्ष कड़े कानून और फास्ट ट्रैक कोर्ट की घोषणाओं के जरिए खुद को समाधानकर्ता के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है. नई राजनीतिक ताकतें जैसे कॉकरोच जनता पार्टी भी इसी मुद्दे के सहारे अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रही है. लेकिन शायद ही कोई दल यह बताता हो कि सरकारी नौकरियों पर निर्भरता कैसे घटेगी, नए करियर कैसे बनेंगे, स्किल आधारित अर्थव्यवस्था कैसे विकसित होगी या परीक्षा प्रणाली में तकनीकी क्रांति कैसे लाई जाएगी? युवाओं की पीड़ा राजनीतिक पूंजी बन गई है, लेकिन दीर्घकालिक सुधार का एजेंडा अब भी गायब है.
पेपर लीक केवल परीक्षा प्रणाली की विफलता नहीं, बल्कि रोजगार, शिक्षा और अर्थव्यवस्था के असंतुलन का प्रतिबिंब है. सख्त कानून जरूरी हैं, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है. यदि सरकार वास्तव में इस संकट को खत्म करना चाहती है, तो उसे दंडात्मक सोच से आगे बढ़ना होगा. परीक्षा प्रणाली में तकनीकी क्रांति, निजी क्षेत्र में रोजगार का विस्तार, करियर के नए विकल्प, स्किल आधारित भर्ती और शिक्षा में संरचनात्मक सुधार- यही स्थायी समाधान हैं. देश ने मेट्रो, डिजिटल भुगतान और ऐप आधारित सेवाओं के जरिए देखा है कि कई बार समाधान पुरानी व्यवस्था को थोड़ा बेहतर बनाने में नहीं, बल्कि पूरी सोच बदलने में होता है. पेपर लीक के मामले में भी अब उसी साहसिक सोच की जरूरत है. यदि अवसर बढ़ेंगे, करियर विविध होंगे और योग्यता को डिग्री से ऊपर रखा जाएगा, तो परीक्षाओं पर अस्वाभाविक दबाव अपने आप घटेगा.
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